Wednesday, November 6, 2013

To dear (Sun-shine-smile girl) Rashmi

सूर्य की रश्मि-सरीखी,
मृदुल, मधु-मुस्कान बिखराती,
सखी मेरी,
मुझे बेहद लुभाती है ।

मेरी प्रतिवेशिनी है वह,
मगर,
षड्-रृतु -सरीखी
साल में छः बार ही
वह दीख पाती है ।

निराली , शोख , चंचल,
और बहुत मासूम-सी
जब भी
वो मिलती है,
वही मीठी अदायें...
क्या करूँ ???
मन मोह लेती है ।

प्रश्न का संदंश

कल-कल-निनादिनी
सरिता-सी चंचल,
निश्छल , गतिशील ,
सखी मेरी,
मुझको
प्रतिदिन
करती हतप्रभ
अपने चक्रासन और शीर्षासन से ।
ठगी-सी मैं
निहारती हूँ
उसको अपलक
प्रतिदिन
औ' सोचती हूँ
कि
"हे भगवन् !
बोलो
कर पाऊंगी
ऐसा कुछ कुछ
मैं भी
इस जीवन में
या
जन्म दुबारा लेना होगा ???

Saturday, October 5, 2013

ब्यूटी-पार्लर

ये ब्यूटी-पार्लर में
गंध छलकाते,
महकते,
साज-सज्जा के लिये तैय्यार,
बहुरंगी,
ये लोशन, तेल और परफ़्यूम,
नासारन्ध्र में जा कर,
मुझे मद-मस्त करके
नींद के नज़दीक लाते हैं ।

उनींदी-सी पड़ी मैं
फिसलती-सी उंगलियों के
स्पर्श को चखती,
सुगन्धित लेप को
महसूस करती -सी
किन्हीं सपनों की
दुनियाँ में पहंुच कर
चौंकती हूँ तब,
कि जब अलसाये हाथों में
थमा कर बिल बहुत मोटा
कोई कोयल
कुहुकती है
थैंक्यू मैम ।

Monday, September 30, 2013

कहानी है...

कहानी है
निरे खालीपने की ,
व्यस्तताओं की,
दुआओं की,
जो हरपल सांस में रस बस रही है;
धड़कनें की ताल पर
हरदम थिरकती
कल्पनाओं की ।
कहीं दूरस्थ देशों में
बसे बैठे
प्रियों के
अनकहे,
बनते, बिगड़ते
स्वप्न-जालों की ।
किन्ही बीते पलों की
मधुर स्मृतियोंकी ।
किन्ही अनजान, अनचिन्ही,
मगर मासूम सी,
अनगढ, उभरती,
स्वप्निकाओं की ।
ये खालीपन मेरा,
मुंझको लुभाता है, रिझाता है ।
यही तो ढाल है मेरी,
जो मेरी अस्मिता को चोट खाने से बचाता है।
इसलिये यह प्रिय मुझे है ।

Wednesday, May 15, 2013

महक उठी बगिया और गमक उठे फूल...

जीवन की बगिया के पावन कुसुमाकर तुम!
शीतल बयार की सुगन्ध-भरी साँस लिये
जब जब भी आये हो मेरे हृदयांगण में
महक उठी बगिया और गमक उठे फूल तभी।

बगिया के जीवन की लम्बी कहानी में
गुन्थे हुये फूलों के गज़रों की साध लिये,
अनजाने, अनचीन्हें, अनदेखे सपनों-सा
थिरकता, कसकता कुछ छन्द-सा जुड़ जाता है।

जब जब भी आये हो मेरे हृदयांगण में
महक उठी बगिया और गमक उठे फूल तभी।

वेदना की ग्रन्थियों को खोल दो।

शून्य हृदयाकाश के उन्मुक्त खग!
जन्म भर की साध को, संगीत को,
सहजता के साथ जीने के लिये
साँस लेने की घड़ी अनमोल दो।
वेदना की ग्रन्थियों को खोल दो।

भव्य जीवन की सभय आाँकाक्ष को
दम-घुटे व्यवहार के तुणीर से
इस तरह मत बेंध दो अय निठुर व्यध!
छटपटाता ही रहे आहत हृदय,
ढ़र न पायें छलछलाते थिर नयन।

जन्म यह अभिशाप था, यह सत्य है।
पा तुम्हें संवरा, सधा, यह सत्य है।
पर मेरे साधक, मेरे सुस्थिर सखे!
दर्द के इस दम-घुटे माहौल से
परिचयान्वित इस कदर हरगिज़ न था।

नींव जिस विश्वास के प्रासाद की
यत्न से रखी गई थी साध कर,
पूर्ण हो प्रासाद, इससे पूर्व ही
दीमकों के रेंगते अहसास  से
सड़ उठेगी नींव, यह सोचा न था।

खुश रहो आकाश के उन्मुक्त खग!
बन्धनों की वेदना से बेख़बर,
गगन-चुम्बी वल्लरी पर झूल कर
इस तरह चहको हुलस कर, झूम कर,
उदय पर ठहरे अनेकों भानु-गण
भी ईर्ष्यान्वित हो उठें बेसुध बने।

Tuesday, May 14, 2013

जड़

मौन रह कर भी सभी कुछ कह गये हो।
द्वीप में अपने सिमट कर रह गये हो।
झांकने भर की इज़ाज़त भी नहीं है।
रास्ते सब बन्द करके जी रहे हो।
कौन सा मासूम धोखा है जिसे तुम पी रहे हो।

तुम्हारे मान-दण्डों पर ख़रा उतरुं,
भला ऐसी कोई औकात मुझमें तो नहीं है।
ये माना बहुत ऊंची वल्लभी पर चढ़ गये हो।
मगर जड़ से जुड़े रहना , खड़े रहने की पहली शर्त  है।

कि जड़ सुन्दर नहीं है, बहुत भद्दी है,
मगर फिर भी वही संजीवनी है।
वहीं से जिन्दगी का स्रोत फूटा है।
कि जिस दिन वह नहीं होगी,
ये फूलों से सजा, खुशबू-भरा,
सुन्दर, सजीला और अलबेला बगीचा
कौन जाने, कौन -सी छवि पायेगा।

मशविरा

कि यूँ ही हार कर सोये, थके,
इक सर्प को तुमने जगाया है।
कहूँ?
निज अस्मिता को डगमगाया है।

तुम्हारे भाल का शोभित तिलक तो
बहुत दिन पहले किसी ने पोंछ डाला था।
कि अब तो दर्प से दीपित, मगर श्री-हीन
चेहरा ही तुम्हारे साथ चलता है।
उसे इस देश में कोई नहीं पहचानता है।

ये मेरा देश है जिसमें सभी
श्री-हीन चेहरों से बिदकते हैं।
कि जिस चेहरे की कान्ति
स्वस्थ एवम् तेजमय हो,
सब उसे सम्मान देते हैं।

ये चेहरा तो बदल सकता नहीं है अब तुम्हारा,
देश ही बदलो,
ये मेरा मशविरा है।

Tuesday, May 7, 2013

मैं............ उर्वशी हूँ।

मैं सहज, सुन्दर, सजग चिर-उर्वशी हूँ,
गन्ध, मादकता भरी रस-गागरी।
छलकती मादक सुधा हर स्पन्द में,
गन्ध बिखराती मधुर शुभ नागरी।

तुम पुरातन पुरुष हो, नृप हो,
नियन्त्रण की प्रथा पहचानते हो।
भव्य जो भी है उसे कर प्राप्त तुम,
भावना निज ललक कर पुचकारते हो।

मैं तुम्हारी आस का चन्दन लगा कर
महकती चहकी फिरु नित शुभ्रतर,
किन्तु कोई अन्य उसको आँज ले,
यह असम्भव है सदा हर हाल में।

Thursday, May 2, 2013

तुम...

साधुवादों के भरे अम्बार से निश-दिन घिरीं तुम
स्वस्थ जीवन की शुभेच्छा को संजोये
कंकरीटों की चुभन को लाँघ कर
राजमहलों की परिधि में जा पड़ीं थीं
वल्लभा बनने किसी नृप-कुंवर की।

किन्तु

नृप-कुंवर के तौर-तेंवर की चुभन
चुभ गई क्या इस कदर मृदु-गात्रि! तन,
याद आई कंकरीटों की सहज, सात्विक चुभन?
लौट आए पाँव व्याकुल इस अंगन।

Tuesday, April 30, 2013

श्री बृजेश नारायण एवं श्रीमती शशिप्रभा के विवाह की स्वर्ण-जयन्ती-समारोह

जीवन एक प्रवाह है।
यह अपने प्रवाह से बहता रहता है।
इस प्रवाह में गति है, जीवन है, शक्ति है।
सम्पूर्ण जीवन-जगत इस प्रवाह के साथ चलता रहता है।
और समय सभी को निरखता-परखता रहता है।
शशिप्रभा जी एवम् बृजेश नारायण जी!
आप दोनों को भी समय ने निरखा और परखा है
और पाया है कि आप दोनों
बेजोड़ हैं,
बेदाग हैं
एवम्
अद्वितीय हैं।

पचास साल के इस दाम्पत्य-जीवन के गृहस्थ-आश्रम में
आप सफल साधक सिद्ध हुये हैं।

इस गृहस्थ आश्रम में रह कर अपना धर्म निभाते हुये
आपने बड़े-बड़े पहाड़ों की ऊंचाइयों को नापा है
और नदियों की गहराइयों को आंका है।

समुंद्र-मन्थन करके आपने अमृत को प्राप्त किया है।
यह सच है...
परन्तु यह भी एक सच है
कि
आपने
दूसरों के कल्याण के लिये
अमृत छोड़ कर
गरल-पान भी किया है।

बृजेश नारायण जी!
आपकी माँ आपको शिव जी कहतीं थीं।
आपकी जीवन-संगिनी बनी
शशिप्रभा जी में
पार्वती माँ स्वयं आ कर विराजित हो गईं।

आप दोनों को हम सभी का सादर/सस्नेह नमन स्वीकार हो।

आप दोनों के लिये उपहार खरीदने के लिये कल मैं बाजार गई थी।
सारा बाजार छान मारा...
यकीन मानिये
आप के कद-सा कदावर कोई उपहार ही नहीं मिला।
सोचा...
भगवान को तो फूल ही भेंट करते हैं।
वही ले कर आ गई।
धन्यवाद,
शुभेच्छु,
शर्मिष्ठा

Monday, April 29, 2013

काश! तुम...

तप्त मरू पर पाँव धर चलते हुयेमैं झुलस भी,
थक भी गयी हूँ।

काश! तुम जल-स्रोत-सी राहत लिये कुछ दूर पर ही दीख जाते।
मैं अभावों की, गरीबी की विवशता मेंसिमट कर बिक रही हूँ।

काश! तुम सामर्थ्य का सम्पूर्ण-सम्बल बनभरे बाज़ार से मुझको बचाते।
किन्तु मैं यह जानती हूँ दर्द का घुटता, उमड़ता बाँकपन, झुलसता, थकता, अभावों की विवशता में बिकाऊ ये बदन,
चिर-अभिप्सित एक सुन्दर स्वप्न की व्याकुल प्रतीक्षा मेंआँख खोले मून्द जायेगा।

आज...यह कैसी स्थिति है?


तुम मेरे बीते दिनों की गन्ध,
मादकता समेटेकिस अन्धेरी खोह की मृदु अंक में जा छुप गई थी।
मैं अन्धेरों में भटकता,
टूटता,
करवट बदलता,
नोकधारी कंकरीटों की चुभन सहता,
सुलगता जी रहा था।

आज यह कैसी स्थिति है?
तुम मेरे सम्मुख समर्पण की शिखा-सी नत पड़ी हो।
और मैं उद्धत शिखर की उच्चतम ऊच्चाइयों के शीश पर पग धर रहा हूँ।

Thursday, April 18, 2013

भगवान! तुमको शत नमन,शत शत नमन...

तुम मेरे जीवन-सरित् के स्रोत!
माथे के मुकुट!
तुम मेरे उज्ज्वल दिवस के भास्कर!
सिर-मौर!
तुम को शत नमन,
शत शत नमन।

शब्द की यह चातुरी, यह माधुरी,
सब समर्पित हैं तुम्हें हे शुभ-सदन!
सहज शाश्वत कल्पना के दिव्य वर!
तुम स्वयम्वर की प्रथा कर दो अमर।

ज्ञान के आलोक की गरिमा प्रकाशित हो।
वन्दना के मूक स्वर ऊर्जा-समन्वित हों।
ध्यान का नीलाभ बिन्दू दिव्यतर हो।
प्राण की यात्रा निरन्तर भव्यतर हो।

Monday, April 8, 2013

गौरव-गाथा

श्रीमती शशिप्रभा ओझा एवम् श्री बृजेश नारायण ओझा जी के शुभ-विवाह का स्वर्ण-जयन्ती-समारोह

श्रीमती शशिप्रभा ओझा...

यह नाम है,
सच्चाई का,
ईमानदारी का,
नैतिकता का
और कर्त्तव्य-निष्ठा का।

इनमें सब कुछ है,
मगर छल-कपट,
धोखा,
फ़रेब,
स्वार्थ-परता
और झूठ गायब हैं।

इन्हें देख कर कभी-कभी हैरान होती हूँ
कि कलयुग का कलश गढते-गढते
सतयुग की मिट्टी की सोन्धी सुगन्ध
इनमें कहाँ से आ विराजी।

इनकी कर्मठता,
कुछ कर गुजरने की ललक,
मुसीबतों से जूझने की चहक
और आसमानी फ़रिश्तों की-सी महक
इनके दैवी गुणों की गौरव-गाथा बयान करते हैं।

ताक़तें आसमानी हों
या धरती की,
शशिप्रभा ओझा जूझ जाती हैं
अपनी पूरी ताकत के साथ
और जीत भी जाती हैं।

भगवान ने इन्हें एक ऐसी
दिव्य-दृष्टि से नवाज़ा है
जिसकी वज़ह से ये
घनघोर अंधेरों में भी
अपनी राह ढून्ढ लेती हैं।

ऊँची से ऊँची ऊँचाइयाँ
अपने को इनके पाँवों तले पाती हैं।
शिखर पर चढ़ कर
उन्मुक्त स्वर में
उद्घोष करते हुए
इनकी वाणी कभी कांपती नहीं है
और पाँव कभी थर्राते नहीं हैं।

अदम्य साहस और उत्साह की प्रतिमा!
शशिप्रभा जी!
हम सभी नत-मस्तक हो कर
आपको शत-शत नमन करते हैं
और आपके गौरव को सलाम करते हैं।

धन्यवाद,

शुभेच्छु,
शर्मिष्ठा शर्मा

Friday, April 5, 2013

अभिनन्दन

श्रीमती शशिप्रभा ओझा एवम् श्री बृजेश नारायण ओझा जी के शुभ-विवाह का स्वर्ण-जयन्ती-समारोह

सागर की गहराइयों को चीर कर समुद्र-मन्थन से निकले चन्द्रमा की शीतल किरणों की तरह शीतल, सुखद एवम् सुन्दर स्वभाव की श्रीमती शशिप्रभा का जन्म स्वर्गीय श्री बलराम पाण्डे एवम् स्वर्गीया श्रीमती रामशृंगारी पाण्डे की तृतीय सन्तान के रुप में हुआ।

आज से ठीक पचास वर्ष पूर्व २१ अप्रैल, १९६३ को आपका शुभ-विवाह श्री बृजेश नारायण ओझा, सुपुत्र स्वर्गीय श्री भागवत ओझा एवम् स्वर्गीया श्रीमती जतना देवी ओझा, के साथ वैदिक विधि से सम्पन्न हुआ था। फूलों के गहनों से सजी-संवरी, गोटे-जड़ी पीली साड़ी पहन कर दुल्हन बनी शशिप्रभा एवम् दूल्हे के पारम्परिक परिधान में सुसज्जित बृजेश नारायण जी की सलोनी छवि आज भी हम सब की यादों में सजग है। आज का दिन आप दोनों के विवाह की स्वर्ण-जयन्ती का दिन है। इस अवसर पर आप दोनों को हम सभी की ओर से कोटिशः बधाई।

इन पचास वर्षों में आप दोनों ने एक-दूसरे का साथ पूरी निष्ठा एवम् ईमानदारी के साथ निभाया है। सरलता एवम् सहजता आप दोनों के चरित्र की विशिष्टता है। झूठी शान-शौकत से कोसों दूर रह कर अपने कर्तव्य-पथ पर अडिग रह कर सच्चाई-पूर्वक अपना धर्म निभाना ही आप दोनों के जीवन का लक्ष्य रहा है। तक़दीर की आँखों में आँखें डाल कर आप दोनों हर उस ताकत से लड़ते रहे, जो आप की राह का रोड़ा बन सकती थी। सब के सुख-दुख में सहभागी बन कर आप दोनों सभी के खुशी-ग़म में शामिल होते रहे हैं।

आज के दिन हम सभी आप दोनों के लिये स्वस्थ, सुखी एवम् उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हैं और भगवान से यह प्रार्थना करते हैं कि ढेर सारी खुशियाँ आप दोनों के जीवन में आयें।

धन्यवाद।
शुभेच्छु,
आपकी बहन - शर्मिष्ठा शर्मा

Monday, February 25, 2013

न जाने क्यों?

न जाने क्यों...
किन्हीं ऊंचे घरों में बस रहे
ये लोग
मुझको देख कर क्यों हँस रहे हैं?

कि मैं बदशक्ल हूँ...
बदरंग हूँ...
और बेवज़ह हूँ...
इसलिये ये लोग मुझको देख कर यूँ हँस रहे हैं।

सबको सलाम...

सभी कुछ तय अगर है,
किसलिये फिर नाटकों का खेल जारी है?
ये दुनियां रंगशाला है।
सभी हम नाट्य-धर्मी हैं।
किसी ने लिख दी तक़दीरें,
हमें तो सिर्फ़ अपना पार्ट करना है

कहीं से पूर्व-निर्धारित है सब कुछ,
हम सभी अज्ञान-वश उससे अपरिचित हैं।
अतः हतप्रभ हैं घटनाओं के क्रम से।

किसी को दोष क्यों दूँ बद्-गुमानी का,
महज़ एक पार्ट है जिसको अदा उसने किया है।
इसलिये अच्छे- बुरे...
सबको सलाम।

भगवान के प्रति...

तुम्हें भी क्या कहूँ आनन्द-घन!
तुम तो बहुत बरसे हो जीवन में।
ये हरियाली तुम्हारी ही कृपा का दिव्य फल है,
और चलती साँस भी तो दान है तेरा कृपालु!
निराली छवि तुम्हारी साथ रहती है
तो ये धरती भी अम्बर-सी
मुझे महसूस होती है।

ये लघुता का आभास...

ये लघुता का सहज आभास मुझको कोसता है,
और
कुछ भी कर गुज़रने की मेरी सामर्थ्य को झकझोरता है।
जो धरती पाँव के नीचे पड़ी थी,
रेत की सी हो गयी है।
फिसलती रेत पर कैसे टिकेंगे ये कदम मेरे,
मुझे कोई बताये।

ये बस्ती है सफलता से प्रफुल्लित
जगमगाते ख़ास लोगों की।
मेरी पहचान शायद खो गयी है।
मेरी शुभ दिव्यता क्यों रो रही है?
मैं क्यूं ठालेपने की नियति जीने को विवश हूँ?
मैं क्यूँ कायर बनी चुपचाप कोने में छिपी हूँ?

ये मेरे साथ के ही लोग आगे बढ गये हैं
और बढते जा रहे हैं।
मगर मेरी सड़क तो सामने से खो गयी है।
मंज़िलें हैं मील के पत्थर सरीखी
और राहें ही कहीं पर खो गयी हैं।
महासंग्राम है पर शक्ति ग़ायब हो गयी है

Monday, February 18, 2013

फूल गेंदा फूल...

आज सुबह...
पीले कपड़ों में सजी-धजी
अवनी को देखा...
लगा मुझे
मधुमास जगा है...
लगा मुझे
कोयल कूहकी है...
लगा मुझे
कोंपल फूटी है...
लगा मुझे
चिड़िया चहकी है...
लगा मुझे
बगिया महकी है...
लगा मुझे
चाँदनी छिटक कर आसमान से
धरती पर ही पसर गयी है...
चुलबुल, नटखट, शोख़, सलोनी अवनी
तुम हो फूल गेंदा फूल।


Saturday, February 16, 2013

घमण्ड...

कौन कहता है कि घमण्ड की कोई शक्ल नहीं होती।
होती है...
और...
बहुत बद्शक्ल होती है।
मैने उसे देखा है...
बहुत बार...
और ...
हर बार...
पाया है कि ये बहुत ओछी चीज़ है।
इसलिये इससे दूर ही रहती हूँ।   

हा हा हा...

कुछ विद्रूप शक्लें मेरा पीछा करती हैं।
मैं उनसे दूर भागना चाहती हूँ।
पर भाग नहीं पाती...
क्योंकि
मेरी गति उतनी तेज नहीं,
जितनी उनके बढ़ते कदमों की ताक़त।
मैं हर ताक़तवर चीज से डरती हूँ।
इसलिये सभी दरवाज़े बन्द कर लेती हूँ।
लेकिन
बन्द दरवाज़े मेरे ख़ौफ़ को कम नहीं कर पाते।
और मैं रोने लगती हूँ।
मेरे रोने से वो विद्रूप शक्लें बहुत खुश होती हैं।
और
मैं उन्हें खुश देखना नहीं चाहती।
इसलिये मैं हँसने लगती हूँ।
वे विद्रूप शक्लें मेरी हँसी से डर जाती हैं।
और
लौट कर अपने रास्तों पर चली जाती हैं।
इसलिये अब मैं हँस रही हूँ
हा हा हा...

Monday, February 11, 2013

मैं क्या करूँ?

जाग जाग कर मन परेशान हो गया है।
अब तो सोने का मन हो रहा है।
मगर मन की परेशानी मुझे सोने नहीं देती।
और जागते रहने से मन और परेशान हो जाता है।

तो मैं क्या करूँ?
सपने देखूँ???

परन्तु सपने देखने के लिये भी तो सोना ज़रूरी है।
जागती आँखों में भला सपने कब आ पाते हैं।
सपने तो मुंदी पलकों में ही रहते हैं।
पलक खुलते ही सपनें दफ़न हो जाते हैं।
तो अब तुम ही कहो!
मैं क्या करूँ???

ये रात...

ये रात...
अंधेरे की बांहों में सिमटी...
अपनी ही सियाही में लिपटी...
ये रात...
अपनी ही नाकामी पर शर्मसार हो कर
बेज़ार  रो रही है।
क्योंकि
जगमगाते बल्बों की रौशनी
इसकी सियाही को निगल रही है
और
टिमटिमाते दीपकों की अवली
इसके अंधेरों को छल रही है।
जी हँा,
ये दीवाली की रात है,
अमावस की रात।

Monday, February 4, 2013

मैं और मेरा गन्तव्य...

मैं नदी की स्वच्छ धारा हूँ,
समर्पण की प्रथा पहचानती हूँ।
रास्ते के सूक्ष्म कंकड़-पत्थरों!
सिर नवा कर धार का पथ छोड़ दो।

एक सागर ही मेरा गन्तव्य है।
रास्ते के शूल बन कर तुम
मुझे पथ-भ्रष्ट कर उन्मार्ग पर
मुझ को प्रवाहित कर नहीं सकते।

मैं हवाओ की पलक पर बैठ कर
 गुनगुनी शुभ धूप के सहयोग से
मेघ की मृदु पालकी में संवर कर
प्रिय सजन की अंक में बिछ जाऊंगी।

Sunday, February 3, 2013

आशिर्वचन...

प्रिय हिमांशु एवम् अनुरिता!
मुबारक़ हो तुम्हें
यह वर्षगांठ विवाह की...

साकार हों सपने सभी
और रंग हो सब में भरा...
शोख़, चटकीला, सुनहरा...
नाज़-नख़रों से भरा...

मेरा आशिर्वचन है यह
कि तुम
खुशहाल, बेहतर,
नित्य सुन्दर
और सुन्दर जिन्दगी पाओ।
सफलता, साध और यश से भरी
लम्बी उमर पाओ।
बहुत लम्बी उमर पाओ

स्नेह और सम्मान से भूषित
यही कुछ पंक्तियाँ
भेंट में
स्वीकार हों।


Friday, February 1, 2013

मेरी नातिन...

फूल-सी नाज़ुक मेरी नातिन!
कि तुम अब कुछ बड़ी-सी हो गयी हो,
इसलिये तुम को वहीं पर छोड कर
मैं आ गयी हूँ
इस अकेली भीड़ में।
ये मेरी दोस्त है,
हमदम है मेरी,
हमसफ़र है।
पर
मेरे एकान्त जीवन की हताशा से
मुझे हरगिज़
बचा पाती नही है।

इसलिये मैं स्वप्न-दर्शी हो गयी हूँ।
ये सपनें ही मुझे
एकान्त जीवन की हताशा से
बचाते हैं।
हंसाते हैं।
रुलाते हैं।
कभी दुःस्वप्न बन कर भी
यूं ही असहाय-सा कर के
मुझे झकझोर जाते हैं।
तभी उपवन में खिलते फूल-सी सुकुमार!
मैं छवि को तुम्हारी देख कर
आश्वस्त हो
भगवान के प्रति प्रार्थना-रत हो
मुंदी पलकों में
तुमको देख लेती हूँ
और यूँ
सामान्य होने का
उपक्रम
खोज लेती हूँ

मौन आमन्त्रण..

मेरी मधु-तारिका आकाश में जा बस गयी है।
उसे मैं देख सकता हूँ, मगर मैं छू नहीं सकता।
कि मैं आकाश से लड़ कर उसे पा लूं,
मगर आकाश से मैं लड़ नहीं सकता।
काश!
कुछ ऐसा हो!
मेरी मघु-तारिका आकाश से ही चू पड़े
और ठीक मेरी ज़िन्दगी के पात्र में टपके।
किन्तु
वह आकाश में ही सो गयी है...
शान्त,गुप-चुप...
बर्फ की सिली-सरिखी मौन।
समझ पाता नहीं इस मौन को मैं क्या कहँू?
समर्पण?...
मौन आमन्त्रण?...
...



Thursday, January 31, 2013

कामना की रूपसी...

रात की स्याही सफेदी ओढ कर
सुबह की शुभ गन्ध को दुलरा गई।
नम हवा पुष्पित कमल की क्रोड में
अर्ध-मूर्छित भ्रमर को सहला गई।

कामना की रूपसी घायल-बदन
आस का चन्दन लगा कर हर सुबह
व्यर्थ ही कुछ जोहती है, टोहती है,
बदन से घायल बेचारी रूपसी।

भटकन..

भव्य को पा लेने की भटकन
कहीं ख़त्म नहीं होती।
फिर भी हम भव्य की तलाश में
भटकते रहते हैं
उम्र-दर-उम्र..

Wednesday, January 30, 2013

कहो, मैं क्या करूँ...

मृदु तरंगों की मृदुल, मादक कथा का वरण कर लँू?
या दिशाओं में भटकते सजल जलकण की व्यथा हर लँू?
कहो, मैं क्या करूँ...

बह रहे पीयूष का अंजन रचा कर आँख में जी लँू?
कि यूं ही सी ललक को बांध कर गठरी बना सी लँू?
कहो, मैं क्या करूँ...

मैं पिपासा की तड़प में डूब निज मादक-व्यथा विस्तार दूँ?
या रिस रहे इस जख्म का मरहम सहज स्वीकार लूँ?
सच कहो, मैं क्या करूँ...

महत्त्वाकांक्षा...

यह मेरे आकाश की सीमा
मेरी दीवार को भी लांघ जाती है।
ये मेरी चेतना की परिधि में घिर कर
विकल बेचैन हो कर छटपटाती है।

इसी की भव्य छाया में जगत का
शुभ-अशुभ व्यापार होता है।
ये जीवन-दायिनी है; सत्य है यह;
बिना इसके जगत विरान है।

किन्तु इसका लांघना सीमा मेरे दीवार की
अपराध है, जिसकी सज़ा इसको मिलेगी।
मैं इसकी गन्ध की बाती जला कर
दीप-माला-सी सजा दूंगी सुभग दीवार पर।

Sunday, January 27, 2013

तुम और मैं...

तुम मेरे आकाश की ऊंचाइयों में उड़
मृदुल कुछ गा रही हो;
सहज इठला रही हो।

मैं कटे पर की व्यथा को झेलता
भू पर पड़ा अकुला रहा हूं;
दर्द को सहला रहा हूं।

न जाने कौन-सा परितोष
मुझको प्यार से पुचकारता है;
दर्द को दुलकारता है।

सब तरफ परिव्याप्त उस परितोष के हित
प्रणत- शिर
नित धन्यवादों का मधुर संदेश देता हूं।

मैं तुम्हारे दर्प के आलोक में बह कर
पिघलता-सा हुआ महसूस करता हूं।
ये मेरी वेदना की गन्ध है।

To my grand-children...

रेशमी अहसास से भरपूर
तुम्हारी नर्म निश्चल- सी छुअन,
मुझको
उनिन्दे-से अन्थेरों की परिधि में डाल कर
परितृप्ति के आलोक का आभास देती है;
मुझे संजीवनी का ताप देती है।

Tuesday, January 22, 2013

मेरे देह की काठी...

घरौंदों में बिके बैठे,
ये थोड़े-से बड़े बौने,
मेरी इस साफ-सुथरी नाक को ही
तोड़ देने को विकल हैं।

किन्तु मेरे देह की काठी
इन्हें चरणाग्र में नत-शिर बना
दहलीच भी छूने नही देती।
ये मेरी नाक तो क्या तोड़ पायेंगे।


ये झूठे लोग...

ये झूठे लोग
जब सच को समर्पित-से बने बैठे
मेरे नज़दीक आते हैं,
तो मन मेरा किसी अज्ञात भय से काँप जाता है।

विवेकी जन मेरे इस व्यर्थ के भ्रम को
मेरे मन की गहन गहराइयों में व्याप्त
विकृत ग्रन्थियों का नाम देते हैं,
जो मेरे ही मनस में व्याप्त
मेरी हीनता को व्यक्त करता है।

मगर यह सच नहीं है।
मुझे सच के मुखौटों की सहज पहचान है,
जिससे कि मैं उस पार क्या है इन मुखौटों के,
इसे भी जान पाती हूं।
सहज पहचान पाती हूं
घृणित उस रूप को,
जो झूठ का है,
किन्तु सच को ओढ कर
आया मेरे नज़दीक था। 

Sunday, January 20, 2013

मैं वह संध्या हूं...

मैं इन्हीं गलियों-दरीचों में भटकती फिर रही थी।
तुम मेरे सौभाग्य का सिन्दूर बन कर आ गये।
मैं इन्हीं घुटती फ़िज़ाओं में सिसकती जी रही थी।
तुम मेरे मन-मीत बन कर सांस  को सहला गये।

धड़कनों के तीव्र स्पन्दन के सहज साक्षी बने तुम।
लरजती, मुड़ती शिराओं के किनारों से लिपट कर,
मन-बदन की लांघ सीमायें; चतुर, चंचल,चपल
तुम अंधेरों की तरह मुझ पर उमड़ कर छा गये।

कौन कहता है अंधेरों से मेरी पटती नहीं है।
मैं वह सन्ध्या हूं सुभग, सुन्दर, सजग, जो
रात को भी रास्ता आलोक का दिखला गई;
पर ख़ुद अंधेरों में सिमट कर रह गई।

धधकता अंगार...(Fire of ambition)

मेरा आकाश मुझको दिख रहा है।
काश! मैं इसमे उड़ानें भर सकूं।
मेरे परिवेश में उड़ते परिन्दों!
मैं तुम्हारे सामने झोली पसारे हूं।
मुझे भी पंख की विद्या सिखा दो।
मेरे इन बाजुओं में पंख ला दो।

ख़ुदा की देन है यह पंख, सच है।
मैं कब इन्कार करती हूं।
किन्तु मेरे ठीक भीतर धधकता अंगार है इक,
जो मुझे आकाश की ऊंचाइयों में
चहचहाने को यूं ही मजबूर करता है।

यह अंगारा मेरी सबसे बड़ी सौगात है।
फ़रिश्तों के जगत की साध है यह।
ख़ुदा के नेक-बक्शे बहुत से
दिलकश नजारों में यही जलवा दिखाता है।
खुले आकाश में उड़ना अगर कोई सिखाता है,
तो सिर्फ़ यह ही सिखाता है।

यह मेरा धधकता अंगार मेरे रास्ते रौशन करेगा
और मेरी साध उड़ पाये, कुछ ऐसा फ़न करेगा।

Friday, January 18, 2013

सच कहो...

ज़िन्दगी के गद्य की गरिमा कहूं
या पद्य की मृदु -मंजरी?
सच कहो...
मैं क्या कहूं तुमको?

बादलों की शक्ल लेते वाष्प-कण की
सजल ऊष्मा के विरोधाभास को
जल-कण कहूं
या तप्त मरू?
सच कहो...
मैं क्या कहूं तुमको?

होंठ पर छलके महकते मुस्कुराहट के
मधुर मकरन्द को
प्रणय-आवेदन कहूं
या मात्र एक स्मिति?
सच कहो...
मैं क्या कहूं तुमको?

Tuesday, January 15, 2013

आत्म-परिचय

मेरे चन्दन-सरीखे शुद्घ तन पर
लेप है शिरीष के सुन्दर सुमन का।
स्वच्छता इसमें बसी है शुद्ध, सात्विक
कयोंकि यह अभिषिक्त है गांगेय जल से।

भाल पर मेरे सुशोभित रक्त-चन्दन का तिलक है।
आंख में है देखने की शक्ति अनुपम।
नाक में मोती-सरीखा श्वांस- धन है
लाल होठों पर विराजित स्मित सफल है।

कर- कमल में कर्म करने की ललक है।
और पावों में दिशायें नापने की चहक है।
अंतरात्मा में उसी जगदीश का शुभ स्मरण है,
जिस की कृपा की ओट में सौभाग्य मेरा सफल है।

जगदीश! तुम को शत नमन,
शत शत नमन स्वीकार हो मेरा।

Monday, January 14, 2013

मैं और मेरा...

मेरे हिस्से का ये आकाश
मेरे ही सूर्य-शशि का भ्रमण-स्थल है।
किसी का भी उपग्रह हो...
मेरे आकाश में सबका प्रवेश निषिद्ध है।
ये मेरे ही सुखद आलोक का संक्रमण-स्थल है।
हवाओं की पलक पर बैठ कर
मैं स्वयं के आकाश की ऊंचाइयों को नाप आती हूं।
ये मेरे ही सजाये स्वप्न की बारादरी है।

दिव्य स्थिति

ये कैसी विकट स्थिति है ?
उमड़ता, डगमग, भटकता क्षीण काया में बंधा
बलहीन मन
रास्ते से भटक कर कच्ची सड़क पर आ गया है।
दृश्य है दयनीय,
किन्तु रम्य है उसके लिये
जो देखता है ललक कर
आकाश को नीचे गिरा कर
पांव से निज
रौंदने का भव्य सपना।

तभी
आकाश के मृदु यान में
संयत, सजग तुम
रास्ते के सेतु बन
अवतरित हो
क्षीण काया में बन्धे
बलहीन मन की
तीव्र पीड़ा को
सहज ही भांप लेते हो।
मेरे आकाश की ऊचाइयों को नाप लेते हो।
ये कैसी दिव्य स्थिति है?





प्रार्थना

जब कभी आकाश को बलहीन पाया है,
तभी निर्मल हृदय से प्रार्थना की है,
कि हे जग के विधाता! कुछ करो,और इस मेरे आकाश को बलहीन होने से बचा लो।
कि धरती की सुनहरी मांग का गहना
मेरे आकाश के शुभ भाल पर जगमग सजा दो।
कि नदियों के किनारों में घिरी जलधार को
आकाश का अमृत बना दो।
कि पर्वत के शिखर पर फूल कर खिलते हुए मन्दार को
आकाश का गहना बना दो।

Tuesday, January 8, 2013

स्वप्न

नीन्द से बोझिल, मुन्दी पलकों के पास,
बेहिचक, बेझिझक आते हैं स्वपन,
वर्जनायें छू नहीं पाती उन्हें।

किन्तु नयनों के थिरकते बांकपन!
खुल गयीं आंखें तो आहत हो स्वप्न,
वर्जनाओं की परिधि में गर््स्त हो,
फड़फड़ाते हैं, उड़ नहीं पाते।

Wednesday, January 2, 2013

एक विचार

अय मेरे मालिक़! मुझे घोड़ा बना दे,
और चाबुक़ हाथ में ले ले।
सामने हो एक लम्बी-सी डगर
और पांव में हो दौड़ने की शक्ति अनुपम।

Tuesday, January 1, 2013

Hello zindagi...

आज १ जनवरी २०१३ है ।
मन बहुत उदास है ।
६ जनवरी को शिकागो से भारत के लिए प्रयाण करूँगी ।
सामान बाँधने की तैयारी आज से ही शुरू कर दूँगी ।
बाँध कर ले जाउंगी...
अपने सारे कपड़े...
कुछ नई खरीदी चीज़ें...
और मेरी नातिन अवनी की ढे़र सारी यादें...
उसके जन्म की...
उसके चहकने की...
उसकी पोपली हँसी की...
उसकी मन्दिर की घंटी सी टुनटुनाती मीठी अ उ म स्वरलहिरी की...
उसकी दूधिया गंध की...
उसके रुदन और मनुहार की...
उसकी नर्म नाज़ुक छुअन की...
उसकी नटखट शरारतों की...
उसके अबोध बचपन की...
और...और...और...
कहाँ तक गिनाऊं??

अब कभी साल - दो साल बाद...
उसे मिलूँगी तो
वो अवनी... अपने पाँवों पर चलती होगी...
शब्दों और वाक्यों में बोलती होगी...
रूनकती होगी...
ठुनकती होगी...
खिलौनों में खेलती होगी...
अपनी फ़रमाइशें करती होगी...
अपनी बात मनवाने के लिये ज़िद करती होगी...
और भी बहुत कुछ करती होगी...
पर वो ये तीन महीने की अवनी नहीं होगी ।

मन बहुत खुश भी है...
७ जनवरी को अपने देश भारत पहुँच जाऊँगी...
अपना घर.... ईशू, अनुरिता और हिमांशु
सुबह - सुबह समाचारपत्र...
चाय की चुस्कियाँ...
पापड़ी, चाट, गोल-गप्पे...
गर्म - गर्म समोसे और जलेबियाँ...
बाजा़र की भीड़ - भाड़...
गहमा - गहमी...
परिचित चेहरे...
सब

सब्जी वाला, प्रेस वाला...
सड़क की सफा़ई वाला... और धूल उड़ाती उसकी लम्बी-सी झाड़ू...
और भी बहुत कुछ...

यूँ मन उदास भी है...
और खुश भी है...
कभी खुशी, कभी ग़म...
यही तो है ज़िंन्दगी...
और ये मुझे बहुत प्यारी है...
अपनी तमाम खुशियों और ग़मों के साथ...
Hello Zindagi !
I Love You.