ये लघुता का सहज आभास मुझको कोसता है,
और
कुछ भी कर गुज़रने की मेरी सामर्थ्य को झकझोरता है।
जो धरती पाँव के नीचे पड़ी थी,
रेत की सी हो गयी है।
फिसलती रेत पर कैसे टिकेंगे ये कदम मेरे,
मुझे कोई बताये।
ये बस्ती है सफलता से प्रफुल्लित
जगमगाते ख़ास लोगों की।
मेरी पहचान शायद खो गयी है।
मेरी शुभ दिव्यता क्यों रो रही है?
मैं क्यूं ठालेपने की नियति जीने को विवश हूँ?
मैं क्यूँ कायर बनी चुपचाप कोने में छिपी हूँ?
ये मेरे साथ के ही लोग आगे बढ गये हैं
और बढते जा रहे हैं।
मगर मेरी सड़क तो सामने से खो गयी है।
मंज़िलें हैं मील के पत्थर सरीखी
और राहें ही कहीं पर खो गयी हैं।
महासंग्राम है पर शक्ति ग़ायब हो गयी है
और
कुछ भी कर गुज़रने की मेरी सामर्थ्य को झकझोरता है।
जो धरती पाँव के नीचे पड़ी थी,
रेत की सी हो गयी है।
फिसलती रेत पर कैसे टिकेंगे ये कदम मेरे,
मुझे कोई बताये।
ये बस्ती है सफलता से प्रफुल्लित
जगमगाते ख़ास लोगों की।
मेरी पहचान शायद खो गयी है।
मेरी शुभ दिव्यता क्यों रो रही है?
मैं क्यूं ठालेपने की नियति जीने को विवश हूँ?
मैं क्यूँ कायर बनी चुपचाप कोने में छिपी हूँ?
ये मेरे साथ के ही लोग आगे बढ गये हैं
और बढते जा रहे हैं।
मगर मेरी सड़क तो सामने से खो गयी है।
मंज़िलें हैं मील के पत्थर सरीखी
और राहें ही कहीं पर खो गयी हैं।
महासंग्राम है पर शक्ति ग़ायब हो गयी है
No comments:
Post a Comment