Wednesday, May 15, 2013

महक उठी बगिया और गमक उठे फूल...

जीवन की बगिया के पावन कुसुमाकर तुम!
शीतल बयार की सुगन्ध-भरी साँस लिये
जब जब भी आये हो मेरे हृदयांगण में
महक उठी बगिया और गमक उठे फूल तभी।

बगिया के जीवन की लम्बी कहानी में
गुन्थे हुये फूलों के गज़रों की साध लिये,
अनजाने, अनचीन्हें, अनदेखे सपनों-सा
थिरकता, कसकता कुछ छन्द-सा जुड़ जाता है।

जब जब भी आये हो मेरे हृदयांगण में
महक उठी बगिया और गमक उठे फूल तभी।

वेदना की ग्रन्थियों को खोल दो।

शून्य हृदयाकाश के उन्मुक्त खग!
जन्म भर की साध को, संगीत को,
सहजता के साथ जीने के लिये
साँस लेने की घड़ी अनमोल दो।
वेदना की ग्रन्थियों को खोल दो।

भव्य जीवन की सभय आाँकाक्ष को
दम-घुटे व्यवहार के तुणीर से
इस तरह मत बेंध दो अय निठुर व्यध!
छटपटाता ही रहे आहत हृदय,
ढ़र न पायें छलछलाते थिर नयन।

जन्म यह अभिशाप था, यह सत्य है।
पा तुम्हें संवरा, सधा, यह सत्य है।
पर मेरे साधक, मेरे सुस्थिर सखे!
दर्द के इस दम-घुटे माहौल से
परिचयान्वित इस कदर हरगिज़ न था।

नींव जिस विश्वास के प्रासाद की
यत्न से रखी गई थी साध कर,
पूर्ण हो प्रासाद, इससे पूर्व ही
दीमकों के रेंगते अहसास  से
सड़ उठेगी नींव, यह सोचा न था।

खुश रहो आकाश के उन्मुक्त खग!
बन्धनों की वेदना से बेख़बर,
गगन-चुम्बी वल्लरी पर झूल कर
इस तरह चहको हुलस कर, झूम कर,
उदय पर ठहरे अनेकों भानु-गण
भी ईर्ष्यान्वित हो उठें बेसुध बने।

Tuesday, May 14, 2013

जड़

मौन रह कर भी सभी कुछ कह गये हो।
द्वीप में अपने सिमट कर रह गये हो।
झांकने भर की इज़ाज़त भी नहीं है।
रास्ते सब बन्द करके जी रहे हो।
कौन सा मासूम धोखा है जिसे तुम पी रहे हो।

तुम्हारे मान-दण्डों पर ख़रा उतरुं,
भला ऐसी कोई औकात मुझमें तो नहीं है।
ये माना बहुत ऊंची वल्लभी पर चढ़ गये हो।
मगर जड़ से जुड़े रहना , खड़े रहने की पहली शर्त  है।

कि जड़ सुन्दर नहीं है, बहुत भद्दी है,
मगर फिर भी वही संजीवनी है।
वहीं से जिन्दगी का स्रोत फूटा है।
कि जिस दिन वह नहीं होगी,
ये फूलों से सजा, खुशबू-भरा,
सुन्दर, सजीला और अलबेला बगीचा
कौन जाने, कौन -सी छवि पायेगा।

मशविरा

कि यूँ ही हार कर सोये, थके,
इक सर्प को तुमने जगाया है।
कहूँ?
निज अस्मिता को डगमगाया है।

तुम्हारे भाल का शोभित तिलक तो
बहुत दिन पहले किसी ने पोंछ डाला था।
कि अब तो दर्प से दीपित, मगर श्री-हीन
चेहरा ही तुम्हारे साथ चलता है।
उसे इस देश में कोई नहीं पहचानता है।

ये मेरा देश है जिसमें सभी
श्री-हीन चेहरों से बिदकते हैं।
कि जिस चेहरे की कान्ति
स्वस्थ एवम् तेजमय हो,
सब उसे सम्मान देते हैं।

ये चेहरा तो बदल सकता नहीं है अब तुम्हारा,
देश ही बदलो,
ये मेरा मशविरा है।

Tuesday, May 7, 2013

मैं............ उर्वशी हूँ।

मैं सहज, सुन्दर, सजग चिर-उर्वशी हूँ,
गन्ध, मादकता भरी रस-गागरी।
छलकती मादक सुधा हर स्पन्द में,
गन्ध बिखराती मधुर शुभ नागरी।

तुम पुरातन पुरुष हो, नृप हो,
नियन्त्रण की प्रथा पहचानते हो।
भव्य जो भी है उसे कर प्राप्त तुम,
भावना निज ललक कर पुचकारते हो।

मैं तुम्हारी आस का चन्दन लगा कर
महकती चहकी फिरु नित शुभ्रतर,
किन्तु कोई अन्य उसको आँज ले,
यह असम्भव है सदा हर हाल में।

Thursday, May 2, 2013

तुम...

साधुवादों के भरे अम्बार से निश-दिन घिरीं तुम
स्वस्थ जीवन की शुभेच्छा को संजोये
कंकरीटों की चुभन को लाँघ कर
राजमहलों की परिधि में जा पड़ीं थीं
वल्लभा बनने किसी नृप-कुंवर की।

किन्तु

नृप-कुंवर के तौर-तेंवर की चुभन
चुभ गई क्या इस कदर मृदु-गात्रि! तन,
याद आई कंकरीटों की सहज, सात्विक चुभन?
लौट आए पाँव व्याकुल इस अंगन।