Wednesday, June 14, 2023

मैं…

बादलों की पालकी में बैठ कर
हर साल सावन में
तुम्हारे द्वार पर
मैं आऊँगी ।

अटारी पर बरस कर,
खिड़कियों से झाँक कर,
फूलों में अपनी गन्ध बिखरा कर,
तुम्हें लोरी सुना कर,
गुनगुनी शुभ धूप के सहयोग से
फिर आसमाँ में लौट जाऊँगी।

नमन

तो तुम चली गईं
उस रात
सब को रोता-बिलखता छोड़ कर ।

मैं 
तो हतप्रभ, भौंचक बना,
देखता ही रह गया।
क्या से क्या हो गया ?

रात की वो सैर ??
सोचता हूँ, 
निकला ही क्यों घर से ??

घर से 
कुछ कदम की ही दूरी पर
मौत तुम्हारी राह देख रही थी।

काश!
मैं भाँप पाता
मौत की इस साज़िश को।

तुम अब नहीं हो
कहीं भी।
अनुपस्थित हो 
मेरे अस्तित्व के घेरे में ।

पर 
सच कहूँ ?
सच कहूँ ??

आज का सच यह है
कि हर जगह
जहाँ भी देखता हूँ
तुम्हीं दिखती हो।
हाँ , तुम्हीं तुम ।

अपनी अनुपस्थिति में भी
उपस्थित हो ।
मेरी हर साँस, हर पल में।

तुम चली तो गईं,
पर मैं 
तुम्हें जाने कहाँ दूँगा ?

तुम
रहोगी हर क्षण, हर पल,
संगिनी बन कर
मेरी यादों में;

धड़कती रहोगी।
मेरी धड़कनों में।

और
मैं हमेशा हमेशा
महसूसता रहूँगा
तुम्हारी अनुपस्थित 
उपस्थिति को ।

आमन्त्रण

आमंत्रण का स्वर गूँजा है ।
मन हर्षित है, 
तन पुलकित है ।

भय-बाधा सब दूर हो गई,
पीड़ा चकनाचूर हो गईं।
मन में इक आश्वस्ति जगी है।

कोलाहल सब दूर हो गया,
अँधियारा काफ़ूर हो गया।
सूरज वाली रात उगी है ।

नाद,नगाड़े और मृदंगम,
ताल-बद्ध होकर अभिनन्दन
करने को तत्पर हैं प्रति-क्षण।

नृत्योत्सुक यह चरण 
थिरकने को आतुर हैं।
पायल की झनकार सुनी है।

आओ, स्वर-लहरी !
वितान बन जाओ
मेरे जीवन पर ।

प्रखर प्रहरी बन कर 
सदैव जागे रहना,
मर्यादा में रह कर।
मुझे मालूम है
गर्व-दीपित भाल पर शोभित
ये चन्दन का तिलक
तुम को बहुत प्रिय है।

ये सोने का सुनहरा हार,
यह शृंगार, मनहर चाल,
ये मनभावन अदायें,
ये सभी तुम को बहुत प्रिय हैं।
मुझे मालूम है।

और यह जो क्षणिक वैभव से 
भरा आगार है,
यह सब तुम्हें प्रिय हैं,
मुझे मालूम है।

पर सखि! सुन लो ,
इन्हीं को ‘ग़र समेटोगी ,
तो रिश्ते चूक जायेंगे ।
और अपने छूट जायेंगे ।

सर्दी के मौसम में
पहने जाने वाले
मेरे शाल,स्वेटर, जॉकेट और कोट
अलमारी में पड़े पड़े
बाट जोह रहे हैं
कि मैं उन्हें पहन लूँ ।

और मैं
साल-दर-साल
उन्हें उलट-पलट कर देखती हूँ
और फिर
संहेज कर रख देती हूँ;
सोचती हूँ …
“कहीं बाहर जाऊँगी 
तो पहनूँगी।”

सर्दी का पूरा मौसम निकल गया
न बाहर गई, न पहन पाई इन्हें।
बेचारे अलमारी में पड़े
यूँही बाट जोहते रहे
साल-दर-साल।

ऐ बादलों …
ऐ बादलों, रिमझिम के रँग लिये कहाँ चले
झूमती उमँग लिये, प्यार की पतँग लिये
जीया मोरे सँग लिये, कहाँ चले
ओहो ओ ओहो …

सनन-सनन पवन घूम-घूम के
बाँसुरी बजाये झूम-झूम के
??? कानों में कहे
प्यार करो, देखो न इनकार करो
अजी सुनो कहाँ चले
ओहो ओहो …

लचक-लचक फूलों की ये डालियाँ
जाने क्‌यूँ बजा रही हैं तालियाँ
दिल में कोई आके कहे
प्यार करो, देखो न इनकार करो
अजी सुनो कहाँ चले

तो तुम चली गईं
उस रात
सब को रोता-बिलखता छोड़ कर ।

मैं 
तो हतप्रभ, भौंचक बना,
देखता ही रह गया।
क्या से क्या हो गया ?

रात की वो सैर ??
सोचता हूँ, 
निकला ही क्यों घर से ??

घर से 
कुछ कदम की ही दूरी पर
मौत तुम्हारी राह देख रही थी।

काश!
मैं भाँप पाता
मौत की इस साज़िश को।

तुम अब नहीं हो
कहीं भी।
अनुपस्थित हो 
मेरे अस्तित्व के घेरे में ।

पर 
सच कहूँ ?
सच कहूँ ??

आज का सच यह है
कि हर जगह
जहाँ भी देखता हूँ
तुम्हीं दिखती हो।
हाँ , तुम्हीं तुम ।

अपनी अनुपस्थिति में भी
उपस्थित हो ।
मेरी हर साँस, हर पल में।

तुम चली तो गईं,
पर मैं 
तुम्हें जाने कहाँ दूँगा ?

तुम
रहोगी हर क्षण, हर पल,
संगिनी बन कर
मेरी यादों में;

धड़कती रहोगी।
मेरी धड़कनों में।

और
मैं हमेशा हमेशा
महसूसता रहूँगा
तुम्हारी अनुपस्थित 
उपस्थिति को ।
यही सच है।

स्वप्नद्रष्टा,
अनमना यह मन,
किसी झूले पे झूले जा रहा है।
आकाश की ऊँचाइयाँ भी माप ले,
ये पींग ऐसी भर रहा है।
बहुत ख़ुश है।

ये भोला मन…
इसे आकाश की ऊँचाइयाँ प्रिय हैं।
इसे आकाश की
रंगीन इन्द्रधनुषी छटा भी
मोह लेती है।

किन्तु मेरे मन !
समझ लो, जान लो !
कि ये आकाश ऊँचा है;
सुन्दर ,सुखद है;
भव्य भी है।
पर यहाँ कोई हमेशा टिक नहीं पाता।

हार कर, थक कर,
गिरोगे जब
धरा की गोद में;
तब तुम्हें 
माँ की तरह
धरती सम्भालेगी ।
ये धरती ठोस है,
दमदार है,
स्वप्न-सी झूठी नहीं,सच है।
यही सच है ।