Monday, February 25, 2013

न जाने क्यों?

न जाने क्यों...
किन्हीं ऊंचे घरों में बस रहे
ये लोग
मुझको देख कर क्यों हँस रहे हैं?

कि मैं बदशक्ल हूँ...
बदरंग हूँ...
और बेवज़ह हूँ...
इसलिये ये लोग मुझको देख कर यूँ हँस रहे हैं।

सबको सलाम...

सभी कुछ तय अगर है,
किसलिये फिर नाटकों का खेल जारी है?
ये दुनियां रंगशाला है।
सभी हम नाट्य-धर्मी हैं।
किसी ने लिख दी तक़दीरें,
हमें तो सिर्फ़ अपना पार्ट करना है

कहीं से पूर्व-निर्धारित है सब कुछ,
हम सभी अज्ञान-वश उससे अपरिचित हैं।
अतः हतप्रभ हैं घटनाओं के क्रम से।

किसी को दोष क्यों दूँ बद्-गुमानी का,
महज़ एक पार्ट है जिसको अदा उसने किया है।
इसलिये अच्छे- बुरे...
सबको सलाम।

भगवान के प्रति...

तुम्हें भी क्या कहूँ आनन्द-घन!
तुम तो बहुत बरसे हो जीवन में।
ये हरियाली तुम्हारी ही कृपा का दिव्य फल है,
और चलती साँस भी तो दान है तेरा कृपालु!
निराली छवि तुम्हारी साथ रहती है
तो ये धरती भी अम्बर-सी
मुझे महसूस होती है।

ये लघुता का आभास...

ये लघुता का सहज आभास मुझको कोसता है,
और
कुछ भी कर गुज़रने की मेरी सामर्थ्य को झकझोरता है।
जो धरती पाँव के नीचे पड़ी थी,
रेत की सी हो गयी है।
फिसलती रेत पर कैसे टिकेंगे ये कदम मेरे,
मुझे कोई बताये।

ये बस्ती है सफलता से प्रफुल्लित
जगमगाते ख़ास लोगों की।
मेरी पहचान शायद खो गयी है।
मेरी शुभ दिव्यता क्यों रो रही है?
मैं क्यूं ठालेपने की नियति जीने को विवश हूँ?
मैं क्यूँ कायर बनी चुपचाप कोने में छिपी हूँ?

ये मेरे साथ के ही लोग आगे बढ गये हैं
और बढते जा रहे हैं।
मगर मेरी सड़क तो सामने से खो गयी है।
मंज़िलें हैं मील के पत्थर सरीखी
और राहें ही कहीं पर खो गयी हैं।
महासंग्राम है पर शक्ति ग़ायब हो गयी है

Monday, February 18, 2013

फूल गेंदा फूल...

आज सुबह...
पीले कपड़ों में सजी-धजी
अवनी को देखा...
लगा मुझे
मधुमास जगा है...
लगा मुझे
कोयल कूहकी है...
लगा मुझे
कोंपल फूटी है...
लगा मुझे
चिड़िया चहकी है...
लगा मुझे
बगिया महकी है...
लगा मुझे
चाँदनी छिटक कर आसमान से
धरती पर ही पसर गयी है...
चुलबुल, नटखट, शोख़, सलोनी अवनी
तुम हो फूल गेंदा फूल।


Saturday, February 16, 2013

घमण्ड...

कौन कहता है कि घमण्ड की कोई शक्ल नहीं होती।
होती है...
और...
बहुत बद्शक्ल होती है।
मैने उसे देखा है...
बहुत बार...
और ...
हर बार...
पाया है कि ये बहुत ओछी चीज़ है।
इसलिये इससे दूर ही रहती हूँ।   

हा हा हा...

कुछ विद्रूप शक्लें मेरा पीछा करती हैं।
मैं उनसे दूर भागना चाहती हूँ।
पर भाग नहीं पाती...
क्योंकि
मेरी गति उतनी तेज नहीं,
जितनी उनके बढ़ते कदमों की ताक़त।
मैं हर ताक़तवर चीज से डरती हूँ।
इसलिये सभी दरवाज़े बन्द कर लेती हूँ।
लेकिन
बन्द दरवाज़े मेरे ख़ौफ़ को कम नहीं कर पाते।
और मैं रोने लगती हूँ।
मेरे रोने से वो विद्रूप शक्लें बहुत खुश होती हैं।
और
मैं उन्हें खुश देखना नहीं चाहती।
इसलिये मैं हँसने लगती हूँ।
वे विद्रूप शक्लें मेरी हँसी से डर जाती हैं।
और
लौट कर अपने रास्तों पर चली जाती हैं।
इसलिये अब मैं हँस रही हूँ
हा हा हा...

Monday, February 11, 2013

मैं क्या करूँ?

जाग जाग कर मन परेशान हो गया है।
अब तो सोने का मन हो रहा है।
मगर मन की परेशानी मुझे सोने नहीं देती।
और जागते रहने से मन और परेशान हो जाता है।

तो मैं क्या करूँ?
सपने देखूँ???

परन्तु सपने देखने के लिये भी तो सोना ज़रूरी है।
जागती आँखों में भला सपने कब आ पाते हैं।
सपने तो मुंदी पलकों में ही रहते हैं।
पलक खुलते ही सपनें दफ़न हो जाते हैं।
तो अब तुम ही कहो!
मैं क्या करूँ???

ये रात...

ये रात...
अंधेरे की बांहों में सिमटी...
अपनी ही सियाही में लिपटी...
ये रात...
अपनी ही नाकामी पर शर्मसार हो कर
बेज़ार  रो रही है।
क्योंकि
जगमगाते बल्बों की रौशनी
इसकी सियाही को निगल रही है
और
टिमटिमाते दीपकों की अवली
इसके अंधेरों को छल रही है।
जी हँा,
ये दीवाली की रात है,
अमावस की रात।

Monday, February 4, 2013

मैं और मेरा गन्तव्य...

मैं नदी की स्वच्छ धारा हूँ,
समर्पण की प्रथा पहचानती हूँ।
रास्ते के सूक्ष्म कंकड़-पत्थरों!
सिर नवा कर धार का पथ छोड़ दो।

एक सागर ही मेरा गन्तव्य है।
रास्ते के शूल बन कर तुम
मुझे पथ-भ्रष्ट कर उन्मार्ग पर
मुझ को प्रवाहित कर नहीं सकते।

मैं हवाओ की पलक पर बैठ कर
 गुनगुनी शुभ धूप के सहयोग से
मेघ की मृदु पालकी में संवर कर
प्रिय सजन की अंक में बिछ जाऊंगी।

Sunday, February 3, 2013

आशिर्वचन...

प्रिय हिमांशु एवम् अनुरिता!
मुबारक़ हो तुम्हें
यह वर्षगांठ विवाह की...

साकार हों सपने सभी
और रंग हो सब में भरा...
शोख़, चटकीला, सुनहरा...
नाज़-नख़रों से भरा...

मेरा आशिर्वचन है यह
कि तुम
खुशहाल, बेहतर,
नित्य सुन्दर
और सुन्दर जिन्दगी पाओ।
सफलता, साध और यश से भरी
लम्बी उमर पाओ।
बहुत लम्बी उमर पाओ

स्नेह और सम्मान से भूषित
यही कुछ पंक्तियाँ
भेंट में
स्वीकार हों।


Friday, February 1, 2013

मेरी नातिन...

फूल-सी नाज़ुक मेरी नातिन!
कि तुम अब कुछ बड़ी-सी हो गयी हो,
इसलिये तुम को वहीं पर छोड कर
मैं आ गयी हूँ
इस अकेली भीड़ में।
ये मेरी दोस्त है,
हमदम है मेरी,
हमसफ़र है।
पर
मेरे एकान्त जीवन की हताशा से
मुझे हरगिज़
बचा पाती नही है।

इसलिये मैं स्वप्न-दर्शी हो गयी हूँ।
ये सपनें ही मुझे
एकान्त जीवन की हताशा से
बचाते हैं।
हंसाते हैं।
रुलाते हैं।
कभी दुःस्वप्न बन कर भी
यूं ही असहाय-सा कर के
मुझे झकझोर जाते हैं।
तभी उपवन में खिलते फूल-सी सुकुमार!
मैं छवि को तुम्हारी देख कर
आश्वस्त हो
भगवान के प्रति प्रार्थना-रत हो
मुंदी पलकों में
तुमको देख लेती हूँ
और यूँ
सामान्य होने का
उपक्रम
खोज लेती हूँ

मौन आमन्त्रण..

मेरी मधु-तारिका आकाश में जा बस गयी है।
उसे मैं देख सकता हूँ, मगर मैं छू नहीं सकता।
कि मैं आकाश से लड़ कर उसे पा लूं,
मगर आकाश से मैं लड़ नहीं सकता।
काश!
कुछ ऐसा हो!
मेरी मघु-तारिका आकाश से ही चू पड़े
और ठीक मेरी ज़िन्दगी के पात्र में टपके।
किन्तु
वह आकाश में ही सो गयी है...
शान्त,गुप-चुप...
बर्फ की सिली-सरिखी मौन।
समझ पाता नहीं इस मौन को मैं क्या कहँू?
समर्पण?...
मौन आमन्त्रण?...
...