Monday, February 4, 2013

मैं और मेरा गन्तव्य...

मैं नदी की स्वच्छ धारा हूँ,
समर्पण की प्रथा पहचानती हूँ।
रास्ते के सूक्ष्म कंकड़-पत्थरों!
सिर नवा कर धार का पथ छोड़ दो।

एक सागर ही मेरा गन्तव्य है।
रास्ते के शूल बन कर तुम
मुझे पथ-भ्रष्ट कर उन्मार्ग पर
मुझ को प्रवाहित कर नहीं सकते।

मैं हवाओ की पलक पर बैठ कर
 गुनगुनी शुभ धूप के सहयोग से
मेघ की मृदु पालकी में संवर कर
प्रिय सजन की अंक में बिछ जाऊंगी।

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