Saturday, February 16, 2013

हा हा हा...

कुछ विद्रूप शक्लें मेरा पीछा करती हैं।
मैं उनसे दूर भागना चाहती हूँ।
पर भाग नहीं पाती...
क्योंकि
मेरी गति उतनी तेज नहीं,
जितनी उनके बढ़ते कदमों की ताक़त।
मैं हर ताक़तवर चीज से डरती हूँ।
इसलिये सभी दरवाज़े बन्द कर लेती हूँ।
लेकिन
बन्द दरवाज़े मेरे ख़ौफ़ को कम नहीं कर पाते।
और मैं रोने लगती हूँ।
मेरे रोने से वो विद्रूप शक्लें बहुत खुश होती हैं।
और
मैं उन्हें खुश देखना नहीं चाहती।
इसलिये मैं हँसने लगती हूँ।
वे विद्रूप शक्लें मेरी हँसी से डर जाती हैं।
और
लौट कर अपने रास्तों पर चली जाती हैं।
इसलिये अब मैं हँस रही हूँ
हा हा हा...

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