Monday, February 11, 2013

ये रात...

ये रात...
अंधेरे की बांहों में सिमटी...
अपनी ही सियाही में लिपटी...
ये रात...
अपनी ही नाकामी पर शर्मसार हो कर
बेज़ार  रो रही है।
क्योंकि
जगमगाते बल्बों की रौशनी
इसकी सियाही को निगल रही है
और
टिमटिमाते दीपकों की अवली
इसके अंधेरों को छल रही है।
जी हँा,
ये दीवाली की रात है,
अमावस की रात।

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