Friday, February 1, 2013

मेरी नातिन...

फूल-सी नाज़ुक मेरी नातिन!
कि तुम अब कुछ बड़ी-सी हो गयी हो,
इसलिये तुम को वहीं पर छोड कर
मैं आ गयी हूँ
इस अकेली भीड़ में।
ये मेरी दोस्त है,
हमदम है मेरी,
हमसफ़र है।
पर
मेरे एकान्त जीवन की हताशा से
मुझे हरगिज़
बचा पाती नही है।

इसलिये मैं स्वप्न-दर्शी हो गयी हूँ।
ये सपनें ही मुझे
एकान्त जीवन की हताशा से
बचाते हैं।
हंसाते हैं।
रुलाते हैं।
कभी दुःस्वप्न बन कर भी
यूं ही असहाय-सा कर के
मुझे झकझोर जाते हैं।
तभी उपवन में खिलते फूल-सी सुकुमार!
मैं छवि को तुम्हारी देख कर
आश्वस्त हो
भगवान के प्रति प्रार्थना-रत हो
मुंदी पलकों में
तुमको देख लेती हूँ
और यूँ
सामान्य होने का
उपक्रम
खोज लेती हूँ

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