Sunday, February 25, 2024

ज्योति शर्मा !
तुम अब नहीं रहीं हमारे बीच।
जाना तो था ही, पर इतनी जल्दी भी क्या थी ?

अपनी शादी की ख़रीददारी में मुझे शामिल कर के तुमने मुझे सम्मानित किया था।
सच कहूँ ?
तुम मुझे भा गई थी और मित्र बन गई थीं ।
यह मित्रता हमेशा रिश्ते पर हावी रही ।

यह फ़ोटो …
यह बेबाक़ हंसी …
ऊफ्फ!
नहीं पता था कि यह अन्तिम मिलन है।
सच में नियति बहुत क्रूर होती है ।

बारादरी

यह मेरे सौभाग्य की बारादरी है ।
तुम
वहीं
कुछ दूर पर
अपने घरौंदे में
पड़े बैठे रहो, 
तकते रहो ।
भीतर प्रवेश निषिद्ध है।

Wednesday, January 17, 2024

मेरी आँखें

मेरी आँखों में मत झाँकों ।
यही वह रास्ता है
जो मेरे मन की
चहरदीवार के भीतर भी जाता है।
बहुत से राज़ हैं भीतर;
क्रन्दन, कराहें और टूटे ख़्वाब 
हैं भीतर।

मेरी मुस्कराती आँखों के किनारों पर
कहीं एक झील है;
नमकीन जल की झील;

मुझे डर है,
तुम्हारे झाँकते ही
झील का नमकीन पानी
अश्रु बन कर बह पड़ेगा ।

यही बेहतर है
कि तुम
 आँखें चुरा कर ही रहो ।