ज्योति शर्मा !
तुम अब नहीं रहीं हमारे बीच।
जाना तो था ही, पर इतनी जल्दी भी क्या थी ?
अपनी शादी की ख़रीददारी में मुझे शामिल कर के तुमने मुझे सम्मानित किया था।
सच कहूँ ?
तुम मुझे भा गई थी और मित्र बन गई थीं ।
यह मित्रता हमेशा रिश्ते पर हावी रही ।
यह फ़ोटो …
यह बेबाक़ हंसी …
ऊफ्फ!
नहीं पता था कि यह अन्तिम मिलन है।
सच में नियति बहुत क्रूर होती है ।
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