Thursday, January 31, 2013

कामना की रूपसी...

रात की स्याही सफेदी ओढ कर
सुबह की शुभ गन्ध को दुलरा गई।
नम हवा पुष्पित कमल की क्रोड में
अर्ध-मूर्छित भ्रमर को सहला गई।

कामना की रूपसी घायल-बदन
आस का चन्दन लगा कर हर सुबह
व्यर्थ ही कुछ जोहती है, टोहती है,
बदन से घायल बेचारी रूपसी।

भटकन..

भव्य को पा लेने की भटकन
कहीं ख़त्म नहीं होती।
फिर भी हम भव्य की तलाश में
भटकते रहते हैं
उम्र-दर-उम्र..

Wednesday, January 30, 2013

कहो, मैं क्या करूँ...

मृदु तरंगों की मृदुल, मादक कथा का वरण कर लँू?
या दिशाओं में भटकते सजल जलकण की व्यथा हर लँू?
कहो, मैं क्या करूँ...

बह रहे पीयूष का अंजन रचा कर आँख में जी लँू?
कि यूं ही सी ललक को बांध कर गठरी बना सी लँू?
कहो, मैं क्या करूँ...

मैं पिपासा की तड़प में डूब निज मादक-व्यथा विस्तार दूँ?
या रिस रहे इस जख्म का मरहम सहज स्वीकार लूँ?
सच कहो, मैं क्या करूँ...

महत्त्वाकांक्षा...

यह मेरे आकाश की सीमा
मेरी दीवार को भी लांघ जाती है।
ये मेरी चेतना की परिधि में घिर कर
विकल बेचैन हो कर छटपटाती है।

इसी की भव्य छाया में जगत का
शुभ-अशुभ व्यापार होता है।
ये जीवन-दायिनी है; सत्य है यह;
बिना इसके जगत विरान है।

किन्तु इसका लांघना सीमा मेरे दीवार की
अपराध है, जिसकी सज़ा इसको मिलेगी।
मैं इसकी गन्ध की बाती जला कर
दीप-माला-सी सजा दूंगी सुभग दीवार पर।

Sunday, January 27, 2013

तुम और मैं...

तुम मेरे आकाश की ऊंचाइयों में उड़
मृदुल कुछ गा रही हो;
सहज इठला रही हो।

मैं कटे पर की व्यथा को झेलता
भू पर पड़ा अकुला रहा हूं;
दर्द को सहला रहा हूं।

न जाने कौन-सा परितोष
मुझको प्यार से पुचकारता है;
दर्द को दुलकारता है।

सब तरफ परिव्याप्त उस परितोष के हित
प्रणत- शिर
नित धन्यवादों का मधुर संदेश देता हूं।

मैं तुम्हारे दर्प के आलोक में बह कर
पिघलता-सा हुआ महसूस करता हूं।
ये मेरी वेदना की गन्ध है।

To my grand-children...

रेशमी अहसास से भरपूर
तुम्हारी नर्म निश्चल- सी छुअन,
मुझको
उनिन्दे-से अन्थेरों की परिधि में डाल कर
परितृप्ति के आलोक का आभास देती है;
मुझे संजीवनी का ताप देती है।

Tuesday, January 22, 2013

मेरे देह की काठी...

घरौंदों में बिके बैठे,
ये थोड़े-से बड़े बौने,
मेरी इस साफ-सुथरी नाक को ही
तोड़ देने को विकल हैं।

किन्तु मेरे देह की काठी
इन्हें चरणाग्र में नत-शिर बना
दहलीच भी छूने नही देती।
ये मेरी नाक तो क्या तोड़ पायेंगे।


ये झूठे लोग...

ये झूठे लोग
जब सच को समर्पित-से बने बैठे
मेरे नज़दीक आते हैं,
तो मन मेरा किसी अज्ञात भय से काँप जाता है।

विवेकी जन मेरे इस व्यर्थ के भ्रम को
मेरे मन की गहन गहराइयों में व्याप्त
विकृत ग्रन्थियों का नाम देते हैं,
जो मेरे ही मनस में व्याप्त
मेरी हीनता को व्यक्त करता है।

मगर यह सच नहीं है।
मुझे सच के मुखौटों की सहज पहचान है,
जिससे कि मैं उस पार क्या है इन मुखौटों के,
इसे भी जान पाती हूं।
सहज पहचान पाती हूं
घृणित उस रूप को,
जो झूठ का है,
किन्तु सच को ओढ कर
आया मेरे नज़दीक था। 

Sunday, January 20, 2013

मैं वह संध्या हूं...

मैं इन्हीं गलियों-दरीचों में भटकती फिर रही थी।
तुम मेरे सौभाग्य का सिन्दूर बन कर आ गये।
मैं इन्हीं घुटती फ़िज़ाओं में सिसकती जी रही थी।
तुम मेरे मन-मीत बन कर सांस  को सहला गये।

धड़कनों के तीव्र स्पन्दन के सहज साक्षी बने तुम।
लरजती, मुड़ती शिराओं के किनारों से लिपट कर,
मन-बदन की लांघ सीमायें; चतुर, चंचल,चपल
तुम अंधेरों की तरह मुझ पर उमड़ कर छा गये।

कौन कहता है अंधेरों से मेरी पटती नहीं है।
मैं वह सन्ध्या हूं सुभग, सुन्दर, सजग, जो
रात को भी रास्ता आलोक का दिखला गई;
पर ख़ुद अंधेरों में सिमट कर रह गई।

धधकता अंगार...(Fire of ambition)

मेरा आकाश मुझको दिख रहा है।
काश! मैं इसमे उड़ानें भर सकूं।
मेरे परिवेश में उड़ते परिन्दों!
मैं तुम्हारे सामने झोली पसारे हूं।
मुझे भी पंख की विद्या सिखा दो।
मेरे इन बाजुओं में पंख ला दो।

ख़ुदा की देन है यह पंख, सच है।
मैं कब इन्कार करती हूं।
किन्तु मेरे ठीक भीतर धधकता अंगार है इक,
जो मुझे आकाश की ऊंचाइयों में
चहचहाने को यूं ही मजबूर करता है।

यह अंगारा मेरी सबसे बड़ी सौगात है।
फ़रिश्तों के जगत की साध है यह।
ख़ुदा के नेक-बक्शे बहुत से
दिलकश नजारों में यही जलवा दिखाता है।
खुले आकाश में उड़ना अगर कोई सिखाता है,
तो सिर्फ़ यह ही सिखाता है।

यह मेरा धधकता अंगार मेरे रास्ते रौशन करेगा
और मेरी साध उड़ पाये, कुछ ऐसा फ़न करेगा।

Friday, January 18, 2013

सच कहो...

ज़िन्दगी के गद्य की गरिमा कहूं
या पद्य की मृदु -मंजरी?
सच कहो...
मैं क्या कहूं तुमको?

बादलों की शक्ल लेते वाष्प-कण की
सजल ऊष्मा के विरोधाभास को
जल-कण कहूं
या तप्त मरू?
सच कहो...
मैं क्या कहूं तुमको?

होंठ पर छलके महकते मुस्कुराहट के
मधुर मकरन्द को
प्रणय-आवेदन कहूं
या मात्र एक स्मिति?
सच कहो...
मैं क्या कहूं तुमको?

Tuesday, January 15, 2013

आत्म-परिचय

मेरे चन्दन-सरीखे शुद्घ तन पर
लेप है शिरीष के सुन्दर सुमन का।
स्वच्छता इसमें बसी है शुद्ध, सात्विक
कयोंकि यह अभिषिक्त है गांगेय जल से।

भाल पर मेरे सुशोभित रक्त-चन्दन का तिलक है।
आंख में है देखने की शक्ति अनुपम।
नाक में मोती-सरीखा श्वांस- धन है
लाल होठों पर विराजित स्मित सफल है।

कर- कमल में कर्म करने की ललक है।
और पावों में दिशायें नापने की चहक है।
अंतरात्मा में उसी जगदीश का शुभ स्मरण है,
जिस की कृपा की ओट में सौभाग्य मेरा सफल है।

जगदीश! तुम को शत नमन,
शत शत नमन स्वीकार हो मेरा।

Monday, January 14, 2013

मैं और मेरा...

मेरे हिस्से का ये आकाश
मेरे ही सूर्य-शशि का भ्रमण-स्थल है।
किसी का भी उपग्रह हो...
मेरे आकाश में सबका प्रवेश निषिद्ध है।
ये मेरे ही सुखद आलोक का संक्रमण-स्थल है।
हवाओं की पलक पर बैठ कर
मैं स्वयं के आकाश की ऊंचाइयों को नाप आती हूं।
ये मेरे ही सजाये स्वप्न की बारादरी है।

दिव्य स्थिति

ये कैसी विकट स्थिति है ?
उमड़ता, डगमग, भटकता क्षीण काया में बंधा
बलहीन मन
रास्ते से भटक कर कच्ची सड़क पर आ गया है।
दृश्य है दयनीय,
किन्तु रम्य है उसके लिये
जो देखता है ललक कर
आकाश को नीचे गिरा कर
पांव से निज
रौंदने का भव्य सपना।

तभी
आकाश के मृदु यान में
संयत, सजग तुम
रास्ते के सेतु बन
अवतरित हो
क्षीण काया में बन्धे
बलहीन मन की
तीव्र पीड़ा को
सहज ही भांप लेते हो।
मेरे आकाश की ऊचाइयों को नाप लेते हो।
ये कैसी दिव्य स्थिति है?





प्रार्थना

जब कभी आकाश को बलहीन पाया है,
तभी निर्मल हृदय से प्रार्थना की है,
कि हे जग के विधाता! कुछ करो,और इस मेरे आकाश को बलहीन होने से बचा लो।
कि धरती की सुनहरी मांग का गहना
मेरे आकाश के शुभ भाल पर जगमग सजा दो।
कि नदियों के किनारों में घिरी जलधार को
आकाश का अमृत बना दो।
कि पर्वत के शिखर पर फूल कर खिलते हुए मन्दार को
आकाश का गहना बना दो।

Tuesday, January 8, 2013

स्वप्न

नीन्द से बोझिल, मुन्दी पलकों के पास,
बेहिचक, बेझिझक आते हैं स्वपन,
वर्जनायें छू नहीं पाती उन्हें।

किन्तु नयनों के थिरकते बांकपन!
खुल गयीं आंखें तो आहत हो स्वप्न,
वर्जनाओं की परिधि में गर््स्त हो,
फड़फड़ाते हैं, उड़ नहीं पाते।

Wednesday, January 2, 2013

एक विचार

अय मेरे मालिक़! मुझे घोड़ा बना दे,
और चाबुक़ हाथ में ले ले।
सामने हो एक लम्बी-सी डगर
और पांव में हो दौड़ने की शक्ति अनुपम।

Tuesday, January 1, 2013

Hello zindagi...

आज १ जनवरी २०१३ है ।
मन बहुत उदास है ।
६ जनवरी को शिकागो से भारत के लिए प्रयाण करूँगी ।
सामान बाँधने की तैयारी आज से ही शुरू कर दूँगी ।
बाँध कर ले जाउंगी...
अपने सारे कपड़े...
कुछ नई खरीदी चीज़ें...
और मेरी नातिन अवनी की ढे़र सारी यादें...
उसके जन्म की...
उसके चहकने की...
उसकी पोपली हँसी की...
उसकी मन्दिर की घंटी सी टुनटुनाती मीठी अ उ म स्वरलहिरी की...
उसकी दूधिया गंध की...
उसके रुदन और मनुहार की...
उसकी नर्म नाज़ुक छुअन की...
उसकी नटखट शरारतों की...
उसके अबोध बचपन की...
और...और...और...
कहाँ तक गिनाऊं??

अब कभी साल - दो साल बाद...
उसे मिलूँगी तो
वो अवनी... अपने पाँवों पर चलती होगी...
शब्दों और वाक्यों में बोलती होगी...
रूनकती होगी...
ठुनकती होगी...
खिलौनों में खेलती होगी...
अपनी फ़रमाइशें करती होगी...
अपनी बात मनवाने के लिये ज़िद करती होगी...
और भी बहुत कुछ करती होगी...
पर वो ये तीन महीने की अवनी नहीं होगी ।

मन बहुत खुश भी है...
७ जनवरी को अपने देश भारत पहुँच जाऊँगी...
अपना घर.... ईशू, अनुरिता और हिमांशु
सुबह - सुबह समाचारपत्र...
चाय की चुस्कियाँ...
पापड़ी, चाट, गोल-गप्पे...
गर्म - गर्म समोसे और जलेबियाँ...
बाजा़र की भीड़ - भाड़...
गहमा - गहमी...
परिचित चेहरे...
सब

सब्जी वाला, प्रेस वाला...
सड़क की सफा़ई वाला... और धूल उड़ाती उसकी लम्बी-सी झाड़ू...
और भी बहुत कुछ...

यूँ मन उदास भी है...
और खुश भी है...
कभी खुशी, कभी ग़म...
यही तो है ज़िंन्दगी...
और ये मुझे बहुत प्यारी है...
अपनी तमाम खुशियों और ग़मों के साथ...
Hello Zindagi !
I Love You.