Tuesday, January 8, 2013

स्वप्न

नीन्द से बोझिल, मुन्दी पलकों के पास,
बेहिचक, बेझिझक आते हैं स्वपन,
वर्जनायें छू नहीं पाती उन्हें।

किन्तु नयनों के थिरकते बांकपन!
खुल गयीं आंखें तो आहत हो स्वप्न,
वर्जनाओं की परिधि में गर््स्त हो,
फड़फड़ाते हैं, उड़ नहीं पाते।

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