Thursday, January 31, 2013

कामना की रूपसी...

रात की स्याही सफेदी ओढ कर
सुबह की शुभ गन्ध को दुलरा गई।
नम हवा पुष्पित कमल की क्रोड में
अर्ध-मूर्छित भ्रमर को सहला गई।

कामना की रूपसी घायल-बदन
आस का चन्दन लगा कर हर सुबह
व्यर्थ ही कुछ जोहती है, टोहती है,
बदन से घायल बेचारी रूपसी।

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