Monday, January 14, 2013

दिव्य स्थिति

ये कैसी विकट स्थिति है ?
उमड़ता, डगमग, भटकता क्षीण काया में बंधा
बलहीन मन
रास्ते से भटक कर कच्ची सड़क पर आ गया है।
दृश्य है दयनीय,
किन्तु रम्य है उसके लिये
जो देखता है ललक कर
आकाश को नीचे गिरा कर
पांव से निज
रौंदने का भव्य सपना।

तभी
आकाश के मृदु यान में
संयत, सजग तुम
रास्ते के सेतु बन
अवतरित हो
क्षीण काया में बन्धे
बलहीन मन की
तीव्र पीड़ा को
सहज ही भांप लेते हो।
मेरे आकाश की ऊचाइयों को नाप लेते हो।
ये कैसी दिव्य स्थिति है?





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