मन बहुत उदास है ।
६ जनवरी को शिकागो से भारत के लिए प्रयाण करूँगी ।
सामान बाँधने की तैयारी आज से ही शुरू कर दूँगी ।
बाँध कर ले जाउंगी...
अपने सारे कपड़े...
कुछ नई खरीदी चीज़ें...
और मेरी नातिन अवनी की ढे़र सारी यादें...
उसके जन्म की...
उसके चहकने की...
उसकी पोपली हँसी की...
उसकी मन्दिर की घंटी सी टुनटुनाती मीठी अ उ म स्वरलहिरी की...
उसकी दूधिया गंध की...
उसके रुदन और मनुहार की...
उसकी नर्म नाज़ुक छुअन की...
उसकी नटखट शरारतों की...
उसके अबोध बचपन की...
और...और...और...
कहाँ तक गिनाऊं??
अब कभी साल - दो साल बाद...
उसे मिलूँगी तो
वो अवनी... अपने पाँवों पर चलती होगी...
शब्दों और वाक्यों में बोलती होगी...
रूनकती होगी...
ठुनकती होगी...
खिलौनों में खेलती होगी...
अपनी फ़रमाइशें करती होगी...
अपनी बात मनवाने के लिये ज़िद करती होगी...
और भी बहुत कुछ करती होगी...
पर वो ये तीन महीने की अवनी नहीं होगी ।
मन बहुत खुश भी है...
७ जनवरी को अपने देश भारत पहुँच जाऊँगी...
अपना घर.... ईशू, अनुरिता और हिमांशु
सुबह - सुबह समाचारपत्र...
चाय की चुस्कियाँ...
पापड़ी, चाट, गोल-गप्पे...
गर्म - गर्म समोसे और जलेबियाँ...
बाजा़र की भीड़ - भाड़...
गहमा - गहमी...
परिचित चेहरे...
सब

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