जब कभी आकाश को बलहीन पाया है,
तभी निर्मल हृदय से प्रार्थना की है,
कि हे जग के विधाता! कुछ करो,और इस मेरे आकाश को बलहीन होने से बचा लो।
कि धरती की सुनहरी मांग का गहना
मेरे आकाश के शुभ भाल पर जगमग सजा दो।
कि नदियों के किनारों में घिरी जलधार को
आकाश का अमृत बना दो।
कि पर्वत के शिखर पर फूल कर खिलते हुए मन्दार को
आकाश का गहना बना दो।
तभी निर्मल हृदय से प्रार्थना की है,
कि हे जग के विधाता! कुछ करो,और इस मेरे आकाश को बलहीन होने से बचा लो।
कि धरती की सुनहरी मांग का गहना
मेरे आकाश के शुभ भाल पर जगमग सजा दो।
कि नदियों के किनारों में घिरी जलधार को
आकाश का अमृत बना दो।
कि पर्वत के शिखर पर फूल कर खिलते हुए मन्दार को
आकाश का गहना बना दो।
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