मृदु तरंगों की मृदुल, मादक कथा का वरण कर लँू?
या दिशाओं में भटकते सजल जलकण की व्यथा हर लँू?
कहो, मैं क्या करूँ...
बह रहे पीयूष का अंजन रचा कर आँख में जी लँू?
कि यूं ही सी ललक को बांध कर गठरी बना सी लँू?
कहो, मैं क्या करूँ...
मैं पिपासा की तड़प में डूब निज मादक-व्यथा विस्तार दूँ?
या रिस रहे इस जख्म का मरहम सहज स्वीकार लूँ?
सच कहो, मैं क्या करूँ...
या दिशाओं में भटकते सजल जलकण की व्यथा हर लँू?
कहो, मैं क्या करूँ...
बह रहे पीयूष का अंजन रचा कर आँख में जी लँू?
कि यूं ही सी ललक को बांध कर गठरी बना सी लँू?
कहो, मैं क्या करूँ...
मैं पिपासा की तड़प में डूब निज मादक-व्यथा विस्तार दूँ?
या रिस रहे इस जख्म का मरहम सहज स्वीकार लूँ?
सच कहो, मैं क्या करूँ...
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