'कही सुनी'... ये मेरा blog है। यहाँ मैं कहूँगी... कुछ अपनी, कुछ जग की... और सुनूँगी... आप सभी की... जीवन की यात्रा, एक विचित्र यात्रा है। यहाँ हर समय, कुछ न कुछ घटता रहता है। कुछ अच्छा... कुछ बुरा... दोनों का अपना स्वाद है, अपना रस है। बेस्वाद कोई भी नहीं है। इन रसों का आस्वादन कराऊँगी मैं... अपनी इस 'कही सुनी' के माध्यम से... आप सभी को...
Sunday, December 30, 2012
Saturday, December 29, 2012
आह! मेरे देव!
मैं तुम्हारी मृदुल मदिरा-सी हँसी के ही लिये
रेत के तपते मरूस्थल को
बिना जूते
सहज ही लाँघने की चूक कर बैठा।
पाँव में मेरे फफोले पड़ गये हैं।
और मेरी साँस भी
मुझको ही तो धिक्कारती है।
इन सभी को मैं निपट लेता,
अगर महसूस कर पाता
कि तुम उस दिन हँसी थी खोल कर दिल।
किन्तु मेरी पारदर्शी दृष्टि मुझको छल नहीं पाई,
आह! मेरे देव! कैसा क्रूर यह आघात कर डाला...
कि मैंने ख़ून के क़तरे तुम्हारी आँख से गिरते हुए देखे।
रेत के तपते मरूस्थल को
बिना जूते
सहज ही लाँघने की चूक कर बैठा।
पाँव में मेरे फफोले पड़ गये हैं।
और मेरी साँस भी
मुझको ही तो धिक्कारती है।
इन सभी को मैं निपट लेता,
अगर महसूस कर पाता
कि तुम उस दिन हँसी थी खोल कर दिल।
किन्तु मेरी पारदर्शी दृष्टि मुझको छल नहीं पाई,
आह! मेरे देव! कैसा क्रूर यह आघात कर डाला...
कि मैंने ख़ून के क़तरे तुम्हारी आँख से गिरते हुए देखे।
Wednesday, December 26, 2012
चाँद
दूर पर इक चाँद चमका है ।
इसे मैं अंक में भर लूँ ??
सजा लूँ गोद में अपनी ??
कि अपनी माँग का गहना बना लूँ ??
क्या करूँ इसका ??
मेरे अपने सभी दूरस्थ देशों में वसे हैं ।
और कहीं भी एक घर मुझको बनाना हे ।
क्यों न मैं इस चाँद को ही घर बना लूं ??
जब, जहाँ, जैसै, जिसे चाहूँ,
चिहुंक कर देख आऊँगी ।
दरो-दीवार की बंदिश न होगी,
रास्तों का ख़ौफ़, टिकने की जगह,
सफ़र दूरस्थ देशों का,
सभी झंझट नदारद...
तो मैं इस चाँद को ही घर बना लूँगी ।
सब समस्यायें सुलझ कर सो गई हैं ।
दूधिया-सी चाँदनी में खो गई हैं ।
इसे मैं अंक में भर लूँ ??
सजा लूँ गोद में अपनी ??
कि अपनी माँग का गहना बना लूँ ??
क्या करूँ इसका ??
मेरे अपने सभी दूरस्थ देशों में वसे हैं ।
और कहीं भी एक घर मुझको बनाना हे ।
क्यों न मैं इस चाँद को ही घर बना लूं ??
जब, जहाँ, जैसै, जिसे चाहूँ,
चिहुंक कर देख आऊँगी ।
दरो-दीवार की बंदिश न होगी,
रास्तों का ख़ौफ़, टिकने की जगह,
सफ़र दूरस्थ देशों का,
सभी झंझट नदारद...
तो मैं इस चाँद को ही घर बना लूँगी ।
सब समस्यायें सुलझ कर सो गई हैं ।
दूधिया-सी चाँदनी में खो गई हैं ।
Monday, December 17, 2012
वाह री नियति...
तन और मन के ताप की सारी तपिश
इन आँसूओं में ढल गई है।
कहीं से बर्फ की सिली सरिखा मौन
मेरे शब्द के अस्तित्व पर ही जम गया है।
कि आँसू बह निकलना चाहते हैं।
मगर यह शर्त है नि:शब्द हों वह।
किन्तु
वाह री नियति!
आँसू जब कभी नि:शब्द निकला है,
सभी शब्दों की सीमा से बहुत ऊपर उठा है।
इन आँसूओं में ढल गई है।
कहीं से बर्फ की सिली सरिखा मौन
मेरे शब्द के अस्तित्व पर ही जम गया है।
कि आँसू बह निकलना चाहते हैं।
मगर यह शर्त है नि:शब्द हों वह।
किन्तु
वाह री नियति!
आँसू जब कभी नि:शब्द निकला है,
सभी शब्दों की सीमा से बहुत ऊपर उठा है।
Saturday, December 15, 2012
पतझड़
आजकल अमेरिका में सर्दी का मौसम चल रहा है। वृक्षों के पत्ते झड़ गये हैं। उनका पतझड़ चल रहा है।
मगर पत्तों के न रहने के बावजूद कोई भी वृक्ष निर्वस्त्र नहीं है। सभी ने पहन रखे हैं रंगीन छोटे-छोटे जगमगाते
बल्बों के वस्त्र...
वृक्षों को बल्बों से सजाने का यह चलन शहर की सुषमा को चार चाँद लगा रहा है।
और
मुझे परदेस में घर की दिवाली याद आ रही है।
मगर पत्तों के न रहने के बावजूद कोई भी वृक्ष निर्वस्त्र नहीं है। सभी ने पहन रखे हैं रंगीन छोटे-छोटे जगमगाते
बल्बों के वस्त्र...
वृक्षों को बल्बों से सजाने का यह चलन शहर की सुषमा को चार चाँद लगा रहा है।
और
मुझे परदेस में घर की दिवाली याद आ रही है।
Friday, December 14, 2012
My grand-daughter Avni
अवनी...
मेरी दो महीने की नातिन...
अपने पालने में सो रही है।
अपनी बन्द पलकों की छावँ में
कौन से सपने देख रही है...
काश ! मैं यह जान पाती।
कभी कभी गहरी नींद में ही
अचानक ज़ोर ज़ोर से रोने लगती है...
क्या डर है उसका...
काश! मैं यह समझ पाती।
मगर
उसके सपने...
उसका डर...
उसके हैं...
सिर्फ़ उसके....
बहुत बार मुस्कुराती भी है...
कान से कान तक की
चौड़ी मुस्कुराहट...
सच कहूँ ???
उस समय ...
मैं तो मैं...
पूरा कमरा मुस्कुरा उठता है।
आजकल...
उसके होठों पर...
कुछ निरर्थक शब्द भी...
चहकने लगे हैं।
यक़ीन मानिये...
जब वह चहकती है...
तो पूरा शिकागो शहर...
चहचहाने लगता है।
मेरी दो महीने की नातिन...
अपने पालने में सो रही है।
अपनी बन्द पलकों की छावँ में
कौन से सपने देख रही है...
काश ! मैं यह जान पाती।
कभी कभी गहरी नींद में ही
अचानक ज़ोर ज़ोर से रोने लगती है...
क्या डर है उसका...
काश! मैं यह समझ पाती।
मगर
उसके सपने...
उसका डर...
उसके हैं...
सिर्फ़ उसके....
बहुत बार मुस्कुराती भी है...
कान से कान तक की
चौड़ी मुस्कुराहट...
सच कहूँ ???
उस समय ...
मैं तो मैं...
पूरा कमरा मुस्कुरा उठता है।
आजकल...
उसके होठों पर...
कुछ निरर्थक शब्द भी...
चहकने लगे हैं।
यक़ीन मानिये...
जब वह चहकती है...
तो पूरा शिकागो शहर...
चहचहाने लगता है।
Thursday, December 13, 2012
परदेस में...
देश अमेरिका... शहर शिकागो...
एक २३ मन्जिला इमारत की २०-वीं मन्जिल के एक फ़्लैट के कमरे में बैठी मैं...
मेरे सामने शीशे की एक अभेद्य दीवार...और उस में से झाँकता पूरा शहर...
एक २३ मन्जिला इमारत की २०-वीं मन्जिल के एक फ़्लैट के कमरे में बैठी मैं...
मेरे सामने शीशे की एक अभेद्य दीवार...और उस में से झाँकता पूरा शहर...
क्या बयान करूँ ???
एक तरफ़ मिशिगन लेक...
दूर तक पसरा पानी का फैलाव...
जहाँ तक देख पा रही हूँ...
पानी ही पानी... सिर्फ पानी...
दूर तक पसरा पानी का फैलाव...
जहाँ तक देख पा रही हूँ...
पानी ही पानी... सिर्फ पानी...
और दूसरी तरफ़... देख पा रही हूँ ...
शिकागो शहर का फैलाव... गगन-चुम्बी इमारतें...
शिकागो शहर का फैलाव... गगन-चुम्बी इमारतें...
साफ़-सुथरी चौड़ी चौड़ी सड़कें... उन पर दौड़ती बड़ी-बड़ी कारें...
पुल... और उन पर चलती रेल गाड़ियाँ...
वग़ैरह-वग़ैरह...
मैं अनमने मन से सभी कुछ देख रही हूँ...
तभी अचानक आसमान की तरफ़ नज़र पड़ी...
देखा...
साफ़-सुथरा, प्रदूषण-रहित, एकदम नीला आसमान...
परंतु...
उस साफ़-सुथरे, प्रदूषण-रहित, एकदम नीले आसमान में एक भी पक्षी नहीं उड़ रहा था...
मन परेशान है... हैरान है...
कहाँ हैं???
छज्जों पर बैठने वाले कबूतर...
आने वाले अतिथि की ख़बर बताने वाले कौवे...
और घर के आँगन में चहकने वाली गौरैया...
बवरा मन ढ़ूंढ़ रहा है... यही सब...
और भी बहुत कुछ...
Wednesday, December 12, 2012
ज़िन्दगी
ज़िन्दगी की राह पर
चल कर,
फिसल कर,
सम्भल कर,
फिर डगमगाती हूँ।
ये कैसी वासना है ज़िन्दगी की,
मौत से भी जूझ जाती हूँ।
ये जीवन नाम है
उस कल्पना का,
जी रहे हैं लोग जिसको?
या कि वह
जो सत्य बन हर क्षण
हृदय के तन्तुओं को बेन्ध कर
साँस लेने के लिये
करता विवश।
चल कर,
फिसल कर,
सम्भल कर,
फिर डगमगाती हूँ।
ये कैसी वासना है ज़िन्दगी की,
मौत से भी जूझ जाती हूँ।
ये जीवन नाम है
उस कल्पना का,
जी रहे हैं लोग जिसको?
या कि वह
जो सत्य बन हर क्षण
हृदय के तन्तुओं को बेन्ध कर
साँस लेने के लिये
करता विवश।
Tuesday, December 11, 2012
'कही सुनी'
'कही सुनी'... ये मेरा blog है।
यहाँ मैं कहूँगी... कुछ अपनी, कुछ जग की...
और सुनूँगी... आप सभी की...
जीवन की यात्रा, एक विचित्र यात्रा है।
यहाँ हर समय, कुछ न कुछ घटता रहता है।
कुछ अच्छा... कुछ बुरा...
दोनों का अपना स्वाद है, अपना रस है।
बेस्वाद कोई भी नहीं है।
इन रसों का आस्वादन कराऊँगी मैं...
अपनी इस 'कही सुनी' के माध्यम से...
आप सभी को...
यहाँ मैं कहूँगी... कुछ अपनी, कुछ जग की...
और सुनूँगी... आप सभी की...
जीवन की यात्रा, एक विचित्र यात्रा है।
यहाँ हर समय, कुछ न कुछ घटता रहता है।
कुछ अच्छा... कुछ बुरा...
दोनों का अपना स्वाद है, अपना रस है।
बेस्वाद कोई भी नहीं है।
इन रसों का आस्वादन कराऊँगी मैं...
अपनी इस 'कही सुनी' के माध्यम से...
आप सभी को...
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