Wednesday, December 12, 2012

ज़िन्दगी

ज़िन्दगी की राह पर
चल कर,
फिसल कर,
सम्भल कर,
फिर डगमगाती हूँ।
ये कैसी वासना है ज़िन्दगी की,
मौत से भी जूझ जाती हूँ।

ये जीवन नाम है
उस कल्पना का,
जी रहे हैं लोग जिसको?
या कि वह
जो सत्य बन हर क्षण
हृदय के तन्तुओं को बेन्ध कर
साँस लेने के लिये
करता विवश।

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