Wednesday, December 26, 2012

चाँद

दूर पर इक चाँद चमका है ।
इसे मैं अंक में भर लूँ ??
सजा लूँ गोद में अपनी ??
कि अपनी माँग का गहना बना लूँ ??
क्या करूँ इसका ??

मेरे अपने सभी दूरस्थ देशों में वसे हैं ।
और कहीं भी एक घर मुझको बनाना हे ।
क्यों न मैं इस चाँद को ही घर बना लूं ??

जब, जहाँ, जैसै, जिसे चाहूँ,
चिहुंक कर देख आऊँगी ।
दरो-दीवार की बंदिश न होगी,
रास्तों का ख़ौफ़, टिकने की जगह,
सफ़र दूरस्थ देशों का,
सभी झंझट नदारद...
तो मैं इस चाँद को ही घर बना लूँगी ।

सब समस्यायें सुलझ कर सो गई हैं ।
दूधिया-सी चाँदनी में खो गई हैं ।



2 comments:

  1. ये रात ये चाँदनी फिर कहाँ, सुन जा दिल की दास्तां...
    चाँदनी रातें प्यार की बातें, सभी तो हैं यहाँ... सुन जा दिल की दास्तां...

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  2. खो गई ज।ने कहाँ...

    आ जा अभी ज़िंदगी है जवाँ...

    सुन जा...

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