Sunday, December 4, 2022

ऑस्ट्रेलिया…

खिली-सी धूप है, जिसमें तपिश है आग जैसी;
समन्दर हैं कि जैसे कर्ण की दरियादिली;
दिगन्तों तक ये पसरे-से हुए मैदान, घाटी या कि पर्वत;
यही ऑस्ट्रेलिया है ।
जी, यही ऑस्ट्रेलिया है ।

खुला आकाश है नीलाभ, निर्मल और गहरा झील जैसा;
नहीं हैं पक्षियों के झुन्ड, जो कलरव से अपने भर सकें नभ की भयंकर रिक्तता को;
यही है भव्यता इस शान्त, नीरव और गहरे झील-सम आकाश की;
यही ऑस्ट्रेलिया है।
जी, यही ऑस्ट्रेलिया है।

ये मनमाने उमड़ते मेघ जब चाहें, बरसते हैं।
ये बारिश है या सावन की मधुर-सी गुनगुनी रस की फुहार ?
ये अपने रसभरे संस्पर्श से सब को लुभाती है।
यही ऑस्ट्रेलिया है।
जी, यही ऑस्ट्रेलिया है ।

समन्दर की उमड़ती लहर पर पटरे लिये,चढ़ते, चहकते लोग;
और कारों में बड़ी रफ़्तार से भागे-से जाते ख़ुशनुमा ये लोग;
परत-दर-परत कपड़ों को पहन कर मुस्कुराते और अकड़ी चाल से चलते हुए ये लोग;
यही ऑस्ट्रेलिया है।
जी, यही ऑस्ट्रेलिया है।

ये ऊँचे, गगन-चुम्बी भव्य भवनों की सुभग गरिमा से मण्डित
झूमते आकाश की छवि देख कर
भौंचक बनी मैं सोचती हूँ
क्या यही ऑस्ट्रेलिया है ??
जी, यही ऑस्ट्रेलिया है।
कहानी है
मेरे बीते दिनों की,
 व्यस्तताओं की,  
निरे ख़ालीपन की;
लड़कपन की, जवानी की,
बुढ़ापे की तरफ़ बढ़ते पगों की ;
चहचहाते शिशु-खगों की
और खाली नीड़ की ।

आँख होगी बन्द जब 
कुछ भी न होगा साथ तब।
मेरे जगदीश !
तुम उस वक़्त भी
रहना मेरे ही साथ में ।
वो वैतरणी तुम्हीं तो पार करवाओगे कान्हा !
तमाशाबीनों की इक भीड़ है
चारों तरफ़ मेरे ;
कि बीहड़ में बिछा कर जाल
छिप कर, मौन रह कर,
देखते हैं जाल में फँसते,
उलझते, फड़फड़ाते
और तड़पते
चारपाये या दुपाये,
पँख-पाये या फ़र्श पर रेंगते,
भयभीत, मुरझाये, सहमते 
जीव को।
मर गया ?
या बच गया ?
क्या फ़र्क़ पड़ता है उन्हें!!
तमाशाबीनों की इक भीड़ है
चारों तरफ़ मेरे ;
कि बीहड़ में बिछा कर जाल
छिप कर, मौन रह कर,
देखते हैं जाल में फँसते,
उलझते, फड़फड़ाते
और तड़पते
चारपाये या दुपाये,
पँख-पाये या फ़र्श पर रेंगते,
भयभीत, मुरझाये, सहमते 
जीव को।
मर गया ?
या बच गया ?
क्या फ़र्क़ पड़ता है उन्हें!!
डरे मन की व्यथा-थाती समेटे
दूर तक चलता, भटकता तन
किसी पक्की सड़क पर आ गया है।
कोई भटकन नहीं है;
राह है सीधी, सहज, बिन मोड़ के;
चलते रहो, चलते रहो।
बहुत सम्भव है,
कहीं कुछ दूर पर 
मंज़िल ही मिल जाये ।
कुछ सींझ रहा है
मन की धधकती आग पर।
कह नहीं सकती 
कि क्या पक रहा है;
पर कुछ तो है 
जो खदक रहा है।

एक हलचल है
बेचैनी-सी;
शब्दों की सीमा से परे।
कैसे बयाँ करूँ कि वो क्या है ?
पर कुछ तो है 
जो खदक रहा है ।
सर्दी के मौसम में
पहने जाने वाले
मेरे शाल,स्वेटर, जॉकेट और कोट
अलमारी में पड़े पड़े
बाट जोह रहे हैं
कि मैं उन्हें पहन लूँ ।

और मैं
साल-दर-साल
उन्हें उलट-पलट कर देखती हूँ
और फिर
संहेज कर रख देती हूँ;
सोचती हूँ …
“कहीं बाहर जाऊँगी 
तो पहनूँगी।”

सर्दी का पूरा मौसम निकल गया
न बाहर गई, न पहन पाई इन्हें।
बेचारे अलमारी में पड़े
यूँही बाट जोहते रहे
साल-दर-साल।
सर्दी के मौसम में
पहने जाने वाले
मेरे शाल,स्वेटर, जॉकेट और कोट
अलमारी में पड़े पड़े
बाट जोह रहे हैं
कि मैं उन्हें पहन लूँ ।

और मैं
साल-दर-साल
उन्हें उलट-पलट कर देखती हूँ
और फिर
संहेज कर रख देती हूँ;
सोचती हूँ …
“कहीं बाहर जाऊँगी 
तो पहनूँगी।”

सर्दी का पूरा मौसम निकल गया
न बाहर गई, न पहन पाई इन्हें।
बेचारे अलमारी में पड़े
यूँही बाट जोहते रहे
साल-दर-साल।

Saturday, December 3, 2022

विडम्बना

अनाहूत तन-मन की कथा निराली है।
जब मन का कोई तार टूट-सा जाता है;
तब तन  भी टुकड़ों टुकड़ों में बँट जाता है।
इन टुकड़ों को समेट कर तुम सहेज रखना;
और व्यथा-कथा को अपने तक सीमित रखना।

सच कहूँ ? सखि!
पोटली बना कर व्यथा-कथा को बांधा था जिस धागे से,
वह कच्चा था और टूट गया,
धागा तो आख़िर धागा था।
खुल गई पोटली और बिखर गई व्यथा-कथा।
फिर भी समेटने की कोशिश की मैनें तो;
पर आँख निगोड़ी बरस पड़ी
और कर दी मेरी कोशिश की ऐसी-तैसी।