Wednesday, November 6, 2013

To dear (Sun-shine-smile girl) Rashmi

सूर्य की रश्मि-सरीखी,
मृदुल, मधु-मुस्कान बिखराती,
सखी मेरी,
मुझे बेहद लुभाती है ।

मेरी प्रतिवेशिनी है वह,
मगर,
षड्-रृतु -सरीखी
साल में छः बार ही
वह दीख पाती है ।

निराली , शोख , चंचल,
और बहुत मासूम-सी
जब भी
वो मिलती है,
वही मीठी अदायें...
क्या करूँ ???
मन मोह लेती है ।

प्रश्न का संदंश

कल-कल-निनादिनी
सरिता-सी चंचल,
निश्छल , गतिशील ,
सखी मेरी,
मुझको
प्रतिदिन
करती हतप्रभ
अपने चक्रासन और शीर्षासन से ।
ठगी-सी मैं
निहारती हूँ
उसको अपलक
प्रतिदिन
औ' सोचती हूँ
कि
"हे भगवन् !
बोलो
कर पाऊंगी
ऐसा कुछ कुछ
मैं भी
इस जीवन में
या
जन्म दुबारा लेना होगा ???