सर्दी के मौसम में
पहने जाने वाले
मेरे शाल,स्वेटर, जॉकेट और कोट
अलमारी में पड़े पड़े
बाट जोह रहे हैं
कि मैं उन्हें पहन लूँ ।
और मैं
साल-दर-साल
उन्हें उलट-पलट कर देखती हूँ
और फिर
संहेज कर रख देती हूँ;
सोचती हूँ …
“कहीं बाहर जाऊँगी
तो पहनूँगी।”
सर्दी का पूरा मौसम निकल गया
न बाहर गई, न पहन पाई इन्हें।
बेचारे अलमारी में पड़े
यूँही बाट जोहते रहे
साल-दर-साल।
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