Saturday, December 3, 2022

विडम्बना

अनाहूत तन-मन की कथा निराली है।
जब मन का कोई तार टूट-सा जाता है;
तब तन  भी टुकड़ों टुकड़ों में बँट जाता है।
इन टुकड़ों को समेट कर तुम सहेज रखना;
और व्यथा-कथा को अपने तक सीमित रखना।

सच कहूँ ? सखि!
पोटली बना कर व्यथा-कथा को बांधा था जिस धागे से,
वह कच्चा था और टूट गया,
धागा तो आख़िर धागा था।
खुल गई पोटली और बिखर गई व्यथा-कथा।
फिर भी समेटने की कोशिश की मैनें तो;
पर आँख निगोड़ी बरस पड़ी
और कर दी मेरी कोशिश की ऐसी-तैसी।

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