Saturday, December 29, 2012

आह! मेरे देव!

मैं तुम्हारी मृदुल मदिरा-सी हँसी  के ही लिये
रेत के तपते मरूस्थल को
बिना जूते
सहज ही लाँघने  की चूक कर बैठा।
पाँव  में मेरे फफोले पड़ गये हैं।
 और मेरी साँस भी
मुझको ही तो धिक्कारती है।
इन सभी को मैं निपट लेता,
अगर महसूस कर पाता
कि तुम उस दिन हँसी थी खोल कर दिल।
किन्तु मेरी पारदर्शी दृष्टि मुझको छल नहीं पाई,
आह! मेरे देव! कैसा क्रूर यह आघात कर डाला...
कि मैंने ख़ून के क़तरे तुम्हारी आँख से गिरते हुए देखे।

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