देश अमेरिका... शहर शिकागो...
एक २३ मन्जिला इमारत की २०-वीं मन्जिल के एक फ़्लैट के कमरे में बैठी मैं...
मेरे सामने शीशे की एक अभेद्य दीवार...और उस में से झाँकता पूरा शहर...
एक २३ मन्जिला इमारत की २०-वीं मन्जिल के एक फ़्लैट के कमरे में बैठी मैं...
मेरे सामने शीशे की एक अभेद्य दीवार...और उस में से झाँकता पूरा शहर...
क्या बयान करूँ ???
एक तरफ़ मिशिगन लेक...
दूर तक पसरा पानी का फैलाव...
जहाँ तक देख पा रही हूँ...
पानी ही पानी... सिर्फ पानी...
दूर तक पसरा पानी का फैलाव...
जहाँ तक देख पा रही हूँ...
पानी ही पानी... सिर्फ पानी...
और दूसरी तरफ़... देख पा रही हूँ ...
शिकागो शहर का फैलाव... गगन-चुम्बी इमारतें...
शिकागो शहर का फैलाव... गगन-चुम्बी इमारतें...
साफ़-सुथरी चौड़ी चौड़ी सड़कें... उन पर दौड़ती बड़ी-बड़ी कारें...
पुल... और उन पर चलती रेल गाड़ियाँ...
वग़ैरह-वग़ैरह...
मैं अनमने मन से सभी कुछ देख रही हूँ...
तभी अचानक आसमान की तरफ़ नज़र पड़ी...
देखा...
साफ़-सुथरा, प्रदूषण-रहित, एकदम नीला आसमान...
परंतु...
उस साफ़-सुथरे, प्रदूषण-रहित, एकदम नीले आसमान में एक भी पक्षी नहीं उड़ रहा था...
मन परेशान है... हैरान है...
कहाँ हैं???
छज्जों पर बैठने वाले कबूतर...
आने वाले अतिथि की ख़बर बताने वाले कौवे...
और घर के आँगन में चहकने वाली गौरैया...
बवरा मन ढ़ूंढ़ रहा है... यही सब...
और भी बहुत कुछ...

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