ये झूठे लोग
जब सच को समर्पित-से बने बैठे
मेरे नज़दीक आते हैं,
तो मन मेरा किसी अज्ञात भय से काँप जाता है।
विवेकी जन मेरे इस व्यर्थ के भ्रम को
मेरे मन की गहन गहराइयों में व्याप्त
विकृत ग्रन्थियों का नाम देते हैं,
जो मेरे ही मनस में व्याप्त
मेरी हीनता को व्यक्त करता है।
मगर यह सच नहीं है।
मुझे सच के मुखौटों की सहज पहचान है,
जिससे कि मैं उस पार क्या है इन मुखौटों के,
इसे भी जान पाती हूं।
सहज पहचान पाती हूं
घृणित उस रूप को,
जो झूठ का है,
किन्तु सच को ओढ कर
आया मेरे नज़दीक था।
जब सच को समर्पित-से बने बैठे
मेरे नज़दीक आते हैं,
तो मन मेरा किसी अज्ञात भय से काँप जाता है।
विवेकी जन मेरे इस व्यर्थ के भ्रम को
मेरे मन की गहन गहराइयों में व्याप्त
विकृत ग्रन्थियों का नाम देते हैं,
जो मेरे ही मनस में व्याप्त
मेरी हीनता को व्यक्त करता है।
मगर यह सच नहीं है।
मुझे सच के मुखौटों की सहज पहचान है,
जिससे कि मैं उस पार क्या है इन मुखौटों के,
इसे भी जान पाती हूं।
सहज पहचान पाती हूं
घृणित उस रूप को,
जो झूठ का है,
किन्तु सच को ओढ कर
आया मेरे नज़दीक था।
आपका ब्लॉग और यह रचना बहुत अच्छी लगी।
ReplyDeleteब्लॉग जगत में आपका हार्दिक स्वागत है।
सादर
एक निवेदन और -
ReplyDeleteकृपया अपने ब्लॉग पर follow option जोड़ लें इससे आपके पाठक भी बढ़ेंगे और उन्हें आपकी नयी पोस्ट तक आने मे सुविधा रहेगी।
इसके लिए आपको लॉगिन करने के बाद layout मे जाना है और Add a Gadget पर क्लिक करना है।
अब जो नयी विंडो खुलेगी उसमे 9th option follow के सामने + के निशान पर क्लिक कर के layout मे save arrangement पर क्लिक कर दीजिएगा। यह ऑप्शन आपके ब्लॉग पर दिखने लगेगा।
सादर
परामर्श के लिये धन्यवाद...
ReplyDeleteThis comment has been removed by the author.
ReplyDelete
ReplyDeleteदिनांक 03/02/2013 को आपकी यह पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपकी प्रतिक्रिया का स्वागत है .
धन्यवाद!
-----------
फिर मुझे धोखा मिला, मैं क्या कहूँ........हलचल का रविवारीय विशेषांक .....रचनाकार--गिरीश पंकज जी