Sunday, January 27, 2013

तुम और मैं...

तुम मेरे आकाश की ऊंचाइयों में उड़
मृदुल कुछ गा रही हो;
सहज इठला रही हो।

मैं कटे पर की व्यथा को झेलता
भू पर पड़ा अकुला रहा हूं;
दर्द को सहला रहा हूं।

न जाने कौन-सा परितोष
मुझको प्यार से पुचकारता है;
दर्द को दुलकारता है।

सब तरफ परिव्याप्त उस परितोष के हित
प्रणत- शिर
नित धन्यवादों का मधुर संदेश देता हूं।

मैं तुम्हारे दर्प के आलोक में बह कर
पिघलता-सा हुआ महसूस करता हूं।
ये मेरी वेदना की गन्ध है।

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