Sunday, January 20, 2013

मैं वह संध्या हूं...

मैं इन्हीं गलियों-दरीचों में भटकती फिर रही थी।
तुम मेरे सौभाग्य का सिन्दूर बन कर आ गये।
मैं इन्हीं घुटती फ़िज़ाओं में सिसकती जी रही थी।
तुम मेरे मन-मीत बन कर सांस  को सहला गये।

धड़कनों के तीव्र स्पन्दन के सहज साक्षी बने तुम।
लरजती, मुड़ती शिराओं के किनारों से लिपट कर,
मन-बदन की लांघ सीमायें; चतुर, चंचल,चपल
तुम अंधेरों की तरह मुझ पर उमड़ कर छा गये।

कौन कहता है अंधेरों से मेरी पटती नहीं है।
मैं वह सन्ध्या हूं सुभग, सुन्दर, सजग, जो
रात को भी रास्ता आलोक का दिखला गई;
पर ख़ुद अंधेरों में सिमट कर रह गई।

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