मेरी मधु-तारिका आकाश में जा बस गयी है।
उसे मैं देख सकता हूँ, मगर मैं छू नहीं सकता।
कि मैं आकाश से लड़ कर उसे पा लूं,
मगर आकाश से मैं लड़ नहीं सकता।
काश!
कुछ ऐसा हो!
मेरी मघु-तारिका आकाश से ही चू पड़े
और ठीक मेरी ज़िन्दगी के पात्र में टपके।
किन्तु
वह आकाश में ही सो गयी है...
शान्त,गुप-चुप...
बर्फ की सिली-सरिखी मौन।
समझ पाता नहीं इस मौन को मैं क्या कहँू?
समर्पण?...
मौन आमन्त्रण?...
...
उसे मैं देख सकता हूँ, मगर मैं छू नहीं सकता।
कि मैं आकाश से लड़ कर उसे पा लूं,
मगर आकाश से मैं लड़ नहीं सकता।
काश!
कुछ ऐसा हो!
मेरी मघु-तारिका आकाश से ही चू पड़े
और ठीक मेरी ज़िन्दगी के पात्र में टपके।
किन्तु
वह आकाश में ही सो गयी है...
शान्त,गुप-चुप...
बर्फ की सिली-सरिखी मौन।
समझ पाता नहीं इस मौन को मैं क्या कहँू?
समर्पण?...
मौन आमन्त्रण?...
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