सभी कुछ तय अगर है,
किसलिये फिर नाटकों का खेल जारी है?
ये दुनियां रंगशाला है।
सभी हम नाट्य-धर्मी हैं।
किसी ने लिख दी तक़दीरें,
हमें तो सिर्फ़ अपना पार्ट करना है
कहीं से पूर्व-निर्धारित है सब कुछ,
हम सभी अज्ञान-वश उससे अपरिचित हैं।
अतः हतप्रभ हैं घटनाओं के क्रम से।
किसी को दोष क्यों दूँ बद्-गुमानी का,
महज़ एक पार्ट है जिसको अदा उसने किया है।
इसलिये अच्छे- बुरे...
सबको सलाम।
किसलिये फिर नाटकों का खेल जारी है?
ये दुनियां रंगशाला है।
सभी हम नाट्य-धर्मी हैं।
किसी ने लिख दी तक़दीरें,
हमें तो सिर्फ़ अपना पार्ट करना है
कहीं से पूर्व-निर्धारित है सब कुछ,
हम सभी अज्ञान-वश उससे अपरिचित हैं।
अतः हतप्रभ हैं घटनाओं के क्रम से।
किसी को दोष क्यों दूँ बद्-गुमानी का,
महज़ एक पार्ट है जिसको अदा उसने किया है।
इसलिये अच्छे- बुरे...
सबको सलाम।
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