Wednesday, June 14, 2023

नमन

तो तुम चली गईं
उस रात
सब को रोता-बिलखता छोड़ कर ।

मैं 
तो हतप्रभ, भौंचक बना,
देखता ही रह गया।
क्या से क्या हो गया ?

रात की वो सैर ??
सोचता हूँ, 
निकला ही क्यों घर से ??

घर से 
कुछ कदम की ही दूरी पर
मौत तुम्हारी राह देख रही थी।

काश!
मैं भाँप पाता
मौत की इस साज़िश को।

तुम अब नहीं हो
कहीं भी।
अनुपस्थित हो 
मेरे अस्तित्व के घेरे में ।

पर 
सच कहूँ ?
सच कहूँ ??

आज का सच यह है
कि हर जगह
जहाँ भी देखता हूँ
तुम्हीं दिखती हो।
हाँ , तुम्हीं तुम ।

अपनी अनुपस्थिति में भी
उपस्थित हो ।
मेरी हर साँस, हर पल में।

तुम चली तो गईं,
पर मैं 
तुम्हें जाने कहाँ दूँगा ?

तुम
रहोगी हर क्षण, हर पल,
संगिनी बन कर
मेरी यादों में;

धड़कती रहोगी।
मेरी धड़कनों में।

और
मैं हमेशा हमेशा
महसूसता रहूँगा
तुम्हारी अनुपस्थित 
उपस्थिति को ।

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