Wednesday, June 14, 2023

यही सच है।

स्वप्नद्रष्टा,
अनमना यह मन,
किसी झूले पे झूले जा रहा है।
आकाश की ऊँचाइयाँ भी माप ले,
ये पींग ऐसी भर रहा है।
बहुत ख़ुश है।

ये भोला मन…
इसे आकाश की ऊँचाइयाँ प्रिय हैं।
इसे आकाश की
रंगीन इन्द्रधनुषी छटा भी
मोह लेती है।

किन्तु मेरे मन !
समझ लो, जान लो !
कि ये आकाश ऊँचा है;
सुन्दर ,सुखद है;
भव्य भी है।
पर यहाँ कोई हमेशा टिक नहीं पाता।

हार कर, थक कर,
गिरोगे जब
धरा की गोद में;
तब तुम्हें 
माँ की तरह
धरती सम्भालेगी ।
ये धरती ठोस है,
दमदार है,
स्वप्न-सी झूठी नहीं,सच है।
यही सच है ।

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