मैं सहज, सुन्दर, सजग चिर-उर्वशी हूँ,
गन्ध, मादकता भरी रस-गागरी।
छलकती मादक सुधा हर स्पन्द में,
गन्ध बिखराती मधुर शुभ नागरी।
तुम पुरातन पुरुष हो, नृप हो,
नियन्त्रण की प्रथा पहचानते हो।
भव्य जो भी है उसे कर प्राप्त तुम,
भावना निज ललक कर पुचकारते हो।
मैं तुम्हारी आस का चन्दन लगा कर
महकती चहकी फिरु नित शुभ्रतर,
किन्तु कोई अन्य उसको आँज ले,
यह असम्भव है सदा हर हाल में।
गन्ध, मादकता भरी रस-गागरी।
छलकती मादक सुधा हर स्पन्द में,
गन्ध बिखराती मधुर शुभ नागरी।
तुम पुरातन पुरुष हो, नृप हो,
नियन्त्रण की प्रथा पहचानते हो।
भव्य जो भी है उसे कर प्राप्त तुम,
भावना निज ललक कर पुचकारते हो।
मैं तुम्हारी आस का चन्दन लगा कर
महकती चहकी फिरु नित शुभ्रतर,
किन्तु कोई अन्य उसको आँज ले,
यह असम्भव है सदा हर हाल में।
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