Wednesday, May 15, 2013

महक उठी बगिया और गमक उठे फूल...

जीवन की बगिया के पावन कुसुमाकर तुम!
शीतल बयार की सुगन्ध-भरी साँस लिये
जब जब भी आये हो मेरे हृदयांगण में
महक उठी बगिया और गमक उठे फूल तभी।

बगिया के जीवन की लम्बी कहानी में
गुन्थे हुये फूलों के गज़रों की साध लिये,
अनजाने, अनचीन्हें, अनदेखे सपनों-सा
थिरकता, कसकता कुछ छन्द-सा जुड़ जाता है।

जब जब भी आये हो मेरे हृदयांगण में
महक उठी बगिया और गमक उठे फूल तभी।

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