Wednesday, May 15, 2013

वेदना की ग्रन्थियों को खोल दो।

शून्य हृदयाकाश के उन्मुक्त खग!
जन्म भर की साध को, संगीत को,
सहजता के साथ जीने के लिये
साँस लेने की घड़ी अनमोल दो।
वेदना की ग्रन्थियों को खोल दो।

भव्य जीवन की सभय आाँकाक्ष को
दम-घुटे व्यवहार के तुणीर से
इस तरह मत बेंध दो अय निठुर व्यध!
छटपटाता ही रहे आहत हृदय,
ढ़र न पायें छलछलाते थिर नयन।

जन्म यह अभिशाप था, यह सत्य है।
पा तुम्हें संवरा, सधा, यह सत्य है।
पर मेरे साधक, मेरे सुस्थिर सखे!
दर्द के इस दम-घुटे माहौल से
परिचयान्वित इस कदर हरगिज़ न था।

नींव जिस विश्वास के प्रासाद की
यत्न से रखी गई थी साध कर,
पूर्ण हो प्रासाद, इससे पूर्व ही
दीमकों के रेंगते अहसास  से
सड़ उठेगी नींव, यह सोचा न था।

खुश रहो आकाश के उन्मुक्त खग!
बन्धनों की वेदना से बेख़बर,
गगन-चुम्बी वल्लरी पर झूल कर
इस तरह चहको हुलस कर, झूम कर,
उदय पर ठहरे अनेकों भानु-गण
भी ईर्ष्यान्वित हो उठें बेसुध बने।

No comments:

Post a Comment