कि यूँ ही हार कर सोये, थके,
इक सर्प को तुमने जगाया है।
कहूँ?
निज अस्मिता को डगमगाया है।
तुम्हारे भाल का शोभित तिलक तो
बहुत दिन पहले किसी ने पोंछ डाला था।
कि अब तो दर्प से दीपित, मगर श्री-हीन
चेहरा ही तुम्हारे साथ चलता है।
उसे इस देश में कोई नहीं पहचानता है।
ये मेरा देश है जिसमें सभी
श्री-हीन चेहरों से बिदकते हैं।
कि जिस चेहरे की कान्ति
स्वस्थ एवम् तेजमय हो,
सब उसे सम्मान देते हैं।
ये चेहरा तो बदल सकता नहीं है अब तुम्हारा,
देश ही बदलो,
ये मेरा मशविरा है।
इक सर्प को तुमने जगाया है।
कहूँ?
निज अस्मिता को डगमगाया है।
तुम्हारे भाल का शोभित तिलक तो
बहुत दिन पहले किसी ने पोंछ डाला था।
कि अब तो दर्प से दीपित, मगर श्री-हीन
चेहरा ही तुम्हारे साथ चलता है।
उसे इस देश में कोई नहीं पहचानता है।
ये मेरा देश है जिसमें सभी
श्री-हीन चेहरों से बिदकते हैं।
कि जिस चेहरे की कान्ति
स्वस्थ एवम् तेजमय हो,
सब उसे सम्मान देते हैं।
ये चेहरा तो बदल सकता नहीं है अब तुम्हारा,
देश ही बदलो,
ये मेरा मशविरा है।
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