तुम मेरे जीवन-सरित् के स्रोत!
माथे के मुकुट!
तुम मेरे उज्ज्वल दिवस के भास्कर!
सिर-मौर!
तुम को शत नमन,
शत शत नमन।
शब्द की यह चातुरी, यह माधुरी,
सब समर्पित हैं तुम्हें हे शुभ-सदन!
सहज शाश्वत कल्पना के दिव्य वर!
तुम स्वयम्वर की प्रथा कर दो अमर।
ज्ञान के आलोक की गरिमा प्रकाशित हो।
वन्दना के मूक स्वर ऊर्जा-समन्वित हों।
ध्यान का नीलाभ बिन्दू दिव्यतर हो।
प्राण की यात्रा निरन्तर भव्यतर हो।
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