Monday, April 29, 2013

आज...यह कैसी स्थिति है?


तुम मेरे बीते दिनों की गन्ध,
मादकता समेटेकिस अन्धेरी खोह की मृदु अंक में जा छुप गई थी।
मैं अन्धेरों में भटकता,
टूटता,
करवट बदलता,
नोकधारी कंकरीटों की चुभन सहता,
सुलगता जी रहा था।

आज यह कैसी स्थिति है?
तुम मेरे सम्मुख समर्पण की शिखा-सी नत पड़ी हो।
और मैं उद्धत शिखर की उच्चतम ऊच्चाइयों के शीश पर पग धर रहा हूँ।

No comments:

Post a Comment