'कही सुनी'... ये मेरा blog है। यहाँ मैं कहूँगी... कुछ अपनी, कुछ जग की... और सुनूँगी... आप सभी की... जीवन की यात्रा, एक विचित्र यात्रा है। यहाँ हर समय, कुछ न कुछ घटता रहता है। कुछ अच्छा... कुछ बुरा... दोनों का अपना स्वाद है, अपना रस है। बेस्वाद कोई भी नहीं है। इन रसों का आस्वादन कराऊँगी मैं... अपनी इस 'कही सुनी' के माध्यम से... आप सभी को...
Monday, April 29, 2013
आज...यह कैसी स्थिति है?
तुम मेरे बीते दिनों की गन्ध,
मादकता समेटेकिस अन्धेरी खोह की मृदु अंक में जा छुप गई थी।
मैं अन्धेरों में भटकता,
टूटता,
करवट बदलता,
नोकधारी कंकरीटों की चुभन सहता,
सुलगता जी रहा था।
आज यह कैसी स्थिति है?
तुम मेरे सम्मुख समर्पण की शिखा-सी नत पड़ी हो।
और मैं उद्धत शिखर की उच्चतम ऊच्चाइयों के शीश पर पग धर रहा हूँ।
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