Monday, April 8, 2013

गौरव-गाथा

श्रीमती शशिप्रभा ओझा एवम् श्री बृजेश नारायण ओझा जी के शुभ-विवाह का स्वर्ण-जयन्ती-समारोह

श्रीमती शशिप्रभा ओझा...

यह नाम है,
सच्चाई का,
ईमानदारी का,
नैतिकता का
और कर्त्तव्य-निष्ठा का।

इनमें सब कुछ है,
मगर छल-कपट,
धोखा,
फ़रेब,
स्वार्थ-परता
और झूठ गायब हैं।

इन्हें देख कर कभी-कभी हैरान होती हूँ
कि कलयुग का कलश गढते-गढते
सतयुग की मिट्टी की सोन्धी सुगन्ध
इनमें कहाँ से आ विराजी।

इनकी कर्मठता,
कुछ कर गुजरने की ललक,
मुसीबतों से जूझने की चहक
और आसमानी फ़रिश्तों की-सी महक
इनके दैवी गुणों की गौरव-गाथा बयान करते हैं।

ताक़तें आसमानी हों
या धरती की,
शशिप्रभा ओझा जूझ जाती हैं
अपनी पूरी ताकत के साथ
और जीत भी जाती हैं।

भगवान ने इन्हें एक ऐसी
दिव्य-दृष्टि से नवाज़ा है
जिसकी वज़ह से ये
घनघोर अंधेरों में भी
अपनी राह ढून्ढ लेती हैं।

ऊँची से ऊँची ऊँचाइयाँ
अपने को इनके पाँवों तले पाती हैं।
शिखर पर चढ़ कर
उन्मुक्त स्वर में
उद्घोष करते हुए
इनकी वाणी कभी कांपती नहीं है
और पाँव कभी थर्राते नहीं हैं।

अदम्य साहस और उत्साह की प्रतिमा!
शशिप्रभा जी!
हम सभी नत-मस्तक हो कर
आपको शत-शत नमन करते हैं
और आपके गौरव को सलाम करते हैं।

धन्यवाद,

शुभेच्छु,
शर्मिष्ठा शर्मा

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