Monday, April 29, 2013

काश! तुम...

तप्त मरू पर पाँव धर चलते हुयेमैं झुलस भी,
थक भी गयी हूँ।

काश! तुम जल-स्रोत-सी राहत लिये कुछ दूर पर ही दीख जाते।
मैं अभावों की, गरीबी की विवशता मेंसिमट कर बिक रही हूँ।

काश! तुम सामर्थ्य का सम्पूर्ण-सम्बल बनभरे बाज़ार से मुझको बचाते।
किन्तु मैं यह जानती हूँ दर्द का घुटता, उमड़ता बाँकपन, झुलसता, थकता, अभावों की विवशता में बिकाऊ ये बदन,
चिर-अभिप्सित एक सुन्दर स्वप्न की व्याकुल प्रतीक्षा मेंआँख खोले मून्द जायेगा।

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