Tuesday, April 30, 2013

श्री बृजेश नारायण एवं श्रीमती शशिप्रभा के विवाह की स्वर्ण-जयन्ती-समारोह

जीवन एक प्रवाह है।
यह अपने प्रवाह से बहता रहता है।
इस प्रवाह में गति है, जीवन है, शक्ति है।
सम्पूर्ण जीवन-जगत इस प्रवाह के साथ चलता रहता है।
और समय सभी को निरखता-परखता रहता है।
शशिप्रभा जी एवम् बृजेश नारायण जी!
आप दोनों को भी समय ने निरखा और परखा है
और पाया है कि आप दोनों
बेजोड़ हैं,
बेदाग हैं
एवम्
अद्वितीय हैं।

पचास साल के इस दाम्पत्य-जीवन के गृहस्थ-आश्रम में
आप सफल साधक सिद्ध हुये हैं।

इस गृहस्थ आश्रम में रह कर अपना धर्म निभाते हुये
आपने बड़े-बड़े पहाड़ों की ऊंचाइयों को नापा है
और नदियों की गहराइयों को आंका है।

समुंद्र-मन्थन करके आपने अमृत को प्राप्त किया है।
यह सच है...
परन्तु यह भी एक सच है
कि
आपने
दूसरों के कल्याण के लिये
अमृत छोड़ कर
गरल-पान भी किया है।

बृजेश नारायण जी!
आपकी माँ आपको शिव जी कहतीं थीं।
आपकी जीवन-संगिनी बनी
शशिप्रभा जी में
पार्वती माँ स्वयं आ कर विराजित हो गईं।

आप दोनों को हम सभी का सादर/सस्नेह नमन स्वीकार हो।

आप दोनों के लिये उपहार खरीदने के लिये कल मैं बाजार गई थी।
सारा बाजार छान मारा...
यकीन मानिये
आप के कद-सा कदावर कोई उपहार ही नहीं मिला।
सोचा...
भगवान को तो फूल ही भेंट करते हैं।
वही ले कर आ गई।
धन्यवाद,
शुभेच्छु,
शर्मिष्ठा

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