कभी इक वक़्त होता था,
दिशायें गूँजती थीं
सत्य की अनुगँूज से ।
कहीं कुछ लोग होते थे,
जो सुनते और समझते थे,
इसे सादर, सभय हो कर ।
धरित्री नाज़ करती थी
वहन कर के उन्हीं को ;
कि ये आकाश उन पर
छत्र बन कर शोभता था;
दिशायें गीत गाती थी
उन्ही यशजीवियों के;
पहाड़ों के शिखर उनको
सिंहासन पर बैठाते थे;
ये सूरज चाँद भी
उनके सहारे
टिमटिमाते थे;
जो दिल उनमें धड़कते थे,
वो सोने के नहीं,
शीशे के होते थे,
मगर फिर भी दमकते थे ।
अभी क्या वक्त आया है ???
कि सच्चाई
पड़ी उघड़ी
निरखती है सभी को;
कोई तो भांप लो मुझको ।
मगर फुरसत किसे है ???
वो ठेकेदार
जो सच्चाइयों के
महल गढ़ता था,
कहीं पर खो गया है;
वो पहरेदार,
जो ईमान पर सबकी
कड़ी इक नज़र रखता था,
कहीं पर सो गया है।
दिशायें गूँजती थीं
सत्य की अनुगँूज से ।
कहीं कुछ लोग होते थे,
जो सुनते और समझते थे,
इसे सादर, सभय हो कर ।
धरित्री नाज़ करती थी
वहन कर के उन्हीं को ;
कि ये आकाश उन पर
छत्र बन कर शोभता था;
दिशायें गीत गाती थी
उन्ही यशजीवियों के;
पहाड़ों के शिखर उनको
सिंहासन पर बैठाते थे;
ये सूरज चाँद भी
उनके सहारे
टिमटिमाते थे;
जो दिल उनमें धड़कते थे,
वो सोने के नहीं,
शीशे के होते थे,
मगर फिर भी दमकते थे ।
अभी क्या वक्त आया है ???
कि सच्चाई
पड़ी उघड़ी
निरखती है सभी को;
कोई तो भांप लो मुझको ।
मगर फुरसत किसे है ???
वो ठेकेदार
जो सच्चाइयों के
महल गढ़ता था,
कहीं पर खो गया है;
वो पहरेदार,
जो ईमान पर सबकी
कड़ी इक नज़र रखता था,
कहीं पर सो गया है।
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