झूमते आकाश का सपना,
कभी जो आंख की मृदु कोर में आ बस गया था,
सहज ही यूं टूट जायेगा।
किसे आभास था यह?
स्वप्न के मिथ्या अहम् का टूटना
कितना सुखावह है...
जाल में कैदी विहग के
मुक्त होने की स्थिति-सम दिव्य।
किन्तु सपना ही सही,
झूमते आकाश का सपना,
टूटने की वेदना तो वेदना है।
वेदना सुखप्रद कभी होती नहीं।
कभी जो आंख की मृदु कोर में आ बस गया था,
सहज ही यूं टूट जायेगा।
किसे आभास था यह?
स्वप्न के मिथ्या अहम् का टूटना
कितना सुखावह है...
जाल में कैदी विहग के
मुक्त होने की स्थिति-सम दिव्य।
किन्तु सपना ही सही,
झूमते आकाश का सपना,
टूटने की वेदना तो वेदना है।
वेदना सुखप्रद कभी होती नहीं।
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