Saturday, June 25, 2022

भ्रष्टाचार

सत्य की सीमा सिमट सकुचा गई है।
झूठ की गरिमा प्रतिष्ठा पा
सहज इतरा रही है।

विश्व के हर प्रश्न की सीमा
सिकुड़ कर
अर्थ पर मंडरा रही है।

ज्ञान की गरिमा भिखारिन बन
बुभुक्षा से तड़प कर
गंदगी को खा रही है।

कौन सी वह खोह है, जिसमें सभी
विश्व भर का सत्य, सुन्दर और शिव
घुटन सो अकुला रहा है।

भ्रष्ट वातावरण के व्यवहार ! कुछ तुम ही कहो।
स्वार्थ-सत्ता के क़फ़न को ओढ कर
कब तलक यूं जल-तरंग बजाओगे?

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