कुछ उमड़ रहा है,
नसों में, पोरों में,
धड़कनों में, साँसों में,
और उच्छ्वासों में;
नीन्द
रात का अन्धेरा
दिन के उजाले को
लील गया है ।
और
अंधेरे की दुल्हन नींद भी
कहीं छुप गई है।
सब घरों की बत्तियाँ गुल हैं,
चहुँ ओर पसरा सन्नाटा
चीख चीख कर कह रहा है,
“सो जाओ; सो जाओ ।”
दुलारी निन्दिया !
अब तो आ ही जाओ
पलकों की छाँव में;
थक गई हूँ,
ले लो अपनी
दिलकश पनाहों में ।
ओउम् शान्ति: शान्ति: शान्ति: ।
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