सहज, सुन्दर और सुभग
शुभ पँख मेरे,
भव्य और ऊँचे इसी आकाश ने
मुझको दिये थे।
मैं इन्हीं का आसरा ले कर
धरा के धाम पर
चहुँ ओर
जाती थी ;
चहकती, फुदकती चिड़िया-सरीखी।
और फिर इक दिन
मेरे ये पँख घायल हो गये।
भगवान्!
नत-मस्तक खड़ी हूँ सामने तेरे।
ये मेरे पँख घायल हैं,
इन्हें तुम स्वस्थ कर दो।
मैं धरा के धाम पर
फिर से चहकना चाहती हूँ।
भगवान्! तुम सर्वज्ञ हो !
और
सर्वशक्तिमान भी हो!
क्या कहूँ तुमसे !
अटल सौभाग्य का वर दो मुझे।
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