छठ का पर्व
सुहाता है,
जब जल में खड़ी
व्रती महिला
के दिव्य तेज से दीप्त,
सुशोभित माथे पर
सिन्दूर संवर कर
अपनी छवि
बिखराता है ।
“उगींऽऽ न सुरुज देव ऽ”
स्वर-लहरी,
भगवान् सूर्य को
शीघ्र प्रकट होने का
आग्रह और मनुहार;
“बनीं न बलम जी कँहरिया”
कह कर छठी मैय्या से
“ पिया के सनेहिया”
बनने का आशीष-भरा
अनुपम उपहार;
फल-फूलों से भरे
सूप को ले कर
जल में खड़ी
प्रार्थना-रत
व्रती महिला !
तुम को
मेरा अभिनन्दन और वन्दन ।
No comments:
Post a Comment