Friday, September 23, 2016

मेरे शुभ श्रेष्ठ गायक !

अभीप्सा के सुरों के श्रेष्ठ गायक !
मैं तुम्हारी जीत का आह्वान करती हूँ ।
तुम्ही तो हो जो मुझको परिधि की
सीमा के बाहर खींच लाते हो ।
तुम्ही तो हो जो मेरे फड़फड़ाते पँखहीन
शरीर को आकाश की गरिमा बताते हो ।
तुम्ही तो हो जो मेरे रिस रहे नासूर पर
आश्वस्ति का चन्दन-भरा मरहम लगाते हो ।

मैं कैसे भूल सकती हूँ तुम्हें शुभ श्रेष्ठ गायक !
तुम
मेरी भवितव्यता को मोड़ कर ऐसी दिशा दो ।
जिसमें
मेरी अस्मिता सम्पूर्ण छवि के साथ मुखरित हो ।
और
दिशान्तों के सभी अन्धे गव्हर में भी
प्रभा का पुँज बन कर झर पड़े ।
और
मेरे रिस रहे नासूर की इस वेदना का स्वर
इसी आकाश की ऊंचाइयों को चूम ले ।

No comments:

Post a Comment